Friday, 8 May 2015

स्मार्ट सिटी पर पंकज श्रीवास्तव की टिपण्णी



श्री विष्णु गुप्त के स्मार्ट सिटी विषयक लेख से प्रेरित हो कर पत्रकार श्री पंकज श्रीवास्तव की ये टिप्पणियां पढने योग्य हैं -

लोग परेशान थे-कैसी होगी स्मार्ट सिटी?क्या -क्या सुविधाएॅ होंगी वहाॅ?वहाॅ के लोगो का जीवन स्तर कैसा होगा?इन स्मार्ट सिटी को बसने-बसाने के लिए किस प्रदेश के किन वर्ग के लोगो को क्या कीमत चुकानी पडेगी। पहली बात तो यह कि जरूरत के मुताबिक शहर बसते रहे हैं,बसाए जाते रहे है।मगध साम्राज्य काल मे गंगा और सोन के संगम पर पाटलिपुत्र बसाया गया था और यही से बौद्ध धर्म का प्रचार,प्रसार और विस्तार चीन, जापान,श्रीलंका आदि देशो को हुआ था। काल के प्रवाह मे धार्मिक तीर्थस्थलो के आसपास शहर बसते रहे है-बनारस,प्रयाग, अमृतसर,अजमेरशरीफ,जगन्नाथपुरी,मदुरैआदि।कुछ शहर व्यावसायिक दृष्टिकोण से समुद्री बंदरगाहों के आसपास बसे-कोलकाता, विशाखापत्तनम,चेन्नई, त्रिवेन्द्रम, गोआ,मुॅबई, सूरत आदि।कुछ शहर प्रशासनिक दृष्टिकोण से राजाओ,बादशाहो की राजधानियो के आसपास बसे-दिल्ली,आगरा,जयपुर, अहमदाबाद, हैदराबाद आदि।ब्रिटिश हूकूमत के कार्यकाल मे दिल्ली को भारत की राजधानी बनाने का निर्णय लिया गया और प्रसिद्ध वास्तुविद लुटयंस की देखरेख मे पुरानी दिल्ली के बगल में नई दिल्ली के रूप में नया राजधानी क्षेत्र का स्वरूप सामने आया और जिसके उदघाटन के लिए सन् 1931 ई.में प्रिस आॅफ वेल्स पधारे थे।स्वातंत्र्योत्तर काल में चंडीगढ पहला ऐसा शहर बसाया गया जो मुहल्लो मे नहीं सेक्टरो मे बॅटा था। पं.जवाहर लाल नेहरू की मिश्रित अर्थव्यवस्था के तहत बोकारो,हटिया, भिलाई,राउरकेला जैसे शहर बनाए गए,बसाए गए।नेहरू इन नए शहरो को गर्व से  आधुनिक मंदिर कहते थे।पिछले तीन दशको मे आधुनिकता के नए दौर में भी दिल्ली के आसपास गुडगाॅव, नोएडा,मुॅबई के पास नई मुॅबई बस गई या फिर बसाई गई लेकिन कभी भी शहर का बसना या बसाया जाना राजनीति के केन्द्र मे नही रहा। लेकिन नरेन्द्र मोदीजी ने 2014 के लोकसभा चुनाव से एक वर्ष पहले से ही वादा करना शुरू कर दिया था कि गुजरात माॅडल का आर्थिक विकास के माॅडल का विस्तार राष्ट्रीय स्तर पर किया जाएगा और इसके महत्वपूर्ण चरण में 100 स्मार्ट सिटी की स्थापना की जाएगी।मोदीजी को एक नए आर्थिक विकास का प्रणेता मानने वाले आशावादियो,जिसमें अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी शामिल है,की अपेक्षा रही है कि इन शहरों में स्तरीय चिकित्सा एवं शिक्षा व्यवस्था होगी,घर,मकान,गलियो और सडको की उचित व्यवस्था होगी। पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण के उचित प्रबंध होंगे।जल,थल और नभ यातायात के उचित व्यवस्था होगी।हर व्यक्ति हर परिवार कंप्यूटर,इंटरनेट, स्मार्टफोन जैसी आधुनिक संचार प्रणाली का अभ्यस्त होगा।हर व्यक्ति, हर परिवार की कुल श्रमशक्ति कौशल सक्षम होगी और अपनी जरूरत की पूर्ति हेतु वह अर्जन में सक्षम होगा।हर व्यक्ति,हर परिवार न सिर्फ वित्तीय रूप साक्षर बल्कि पर्याप्त सक्षम होगा। लेकिन आशंका व्यक्त करने वालो की भी कोई कमी नही है।उन्हे लगता है कि बार-बार आ रहा भूमि अधिग्रहण अध्यादेश और संभावित भूमिग्रहण कानून की जल्दबाजी ही इसलिए है कि सरकार अपनी शर्तो पर किसानों की जमीन अधिग्रहित कर कारपोरेट घरानो को उपलब्ध कराएगी।गगनचुंबी एपार्टमेंट और माॅल्स के निर्माण में,फ्लाईओवर और मल्टीलेन सडको के निर्माण मे कालाधन कुबेर रूपया में तीन अठन्नी बनाएॅगे।इन स्मार्ट सिटी में मेहनत मजदूरी कर रोज कमाने खाने वालो की कोई जगह नही होगी।यह ऐसे सफेदपोश लोगो की जलकुॅभी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करेगी जो जड से कट गए है लेकिन छायादार और फलदार वृक्ष नही हो सकते। लेकिन वर्तमान मोदी सरकार के एक वर्ष पूरे होने को आए सरकारने इस विषय पर तकरीबन मौन साध रखा था।अतः न तो आशावादियो की उम्मीदे फलीभूत हो रही थी और न आशंका से घिरे लोग उबर पा रहे थे।लम्बी चुप्पी के बाद सरकार ने मौन तोडा है और यह घोषणा हुई है कि 2015-16 में 20,2016-17में 40,2017-18 में 40 शहरो को स्मार्ट किया जाएगा।जिन 100 शहरों की सूची जारी की गई है उसमे कोई भी नया शहर नही है।इस देश के पैमाने से सभी पहले ही विकसित शहर है।अर्थात् पहले ही चरण में सरकार अपने वादे,अपनी घोषणा से पीछे हट गई है।वह 100 स्मार्ट सिटी बनाने या बसाने नही जा रही बल्कि 100 शहरो को स्मार्ट करने जा रही है।एक अपुष्ट सूचना के अनुसार इस मद में इन तीन वर्षो में 48000 करोड खर्च किए जाएॅगे अर्थात् प्रति शहर औसत 480करोड सरकार खर्च करेगी। 1985 मे ही तत्कालीन प्रधान मंत्री स्व. राजीव गाॅधी ने स्वीकार किया था कि सरकार द्वारा खर्च किए गए प्रत्येक रूपये में 85 पैसे भ्रष्टाचार की भेंट चढ जाता है,वास्तविक परिणाम 15 पैसे का ही दृष्टिगोचर होता है।इस पैमाने पर प्रत्येक शहर पर औसत खर्च किए जाने वाले 480 करोड मे से बमुश्किल 72 करोड के परिणाम दृष्टिगोचर होंगे।लेकिन इतने पैसो मे तो किसी शहर मे ढंग का एक माॅल नहीं बन सकता।

1 comment:

  1. Very one-sided and cynical approach ! One should read "City in History" by Mumford before writing anything on cities . Cities are the inevitable future ; it is upto the the regulators whether they try to influence its growth and contours or allow it to grow unchecked.

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