Friday, 8 May 2015

स्मार्ट सिटी पर पंकज श्रीवास्तव की टिपण्णी



श्री विष्णु गुप्त के स्मार्ट सिटी विषयक लेख से प्रेरित हो कर पत्रकार श्री पंकज श्रीवास्तव की ये टिप्पणियां पढने योग्य हैं -

लोग परेशान थे-कैसी होगी स्मार्ट सिटी?क्या -क्या सुविधाएॅ होंगी वहाॅ?वहाॅ के लोगो का जीवन स्तर कैसा होगा?इन स्मार्ट सिटी को बसने-बसाने के लिए किस प्रदेश के किन वर्ग के लोगो को क्या कीमत चुकानी पडेगी। पहली बात तो यह कि जरूरत के मुताबिक शहर बसते रहे हैं,बसाए जाते रहे है।मगध साम्राज्य काल मे गंगा और सोन के संगम पर पाटलिपुत्र बसाया गया था और यही से बौद्ध धर्म का प्रचार,प्रसार और विस्तार चीन, जापान,श्रीलंका आदि देशो को हुआ था। काल के प्रवाह मे धार्मिक तीर्थस्थलो के आसपास शहर बसते रहे है-बनारस,प्रयाग, अमृतसर,अजमेरशरीफ,जगन्नाथपुरी,मदुरैआदि।कुछ शहर व्यावसायिक दृष्टिकोण से समुद्री बंदरगाहों के आसपास बसे-कोलकाता, विशाखापत्तनम,चेन्नई, त्रिवेन्द्रम, गोआ,मुॅबई, सूरत आदि।कुछ शहर प्रशासनिक दृष्टिकोण से राजाओ,बादशाहो की राजधानियो के आसपास बसे-दिल्ली,आगरा,जयपुर, अहमदाबाद, हैदराबाद आदि।ब्रिटिश हूकूमत के कार्यकाल मे दिल्ली को भारत की राजधानी बनाने का निर्णय लिया गया और प्रसिद्ध वास्तुविद लुटयंस की देखरेख मे पुरानी दिल्ली के बगल में नई दिल्ली के रूप में नया राजधानी क्षेत्र का स्वरूप सामने आया और जिसके उदघाटन के लिए सन् 1931 ई.में प्रिस आॅफ वेल्स पधारे थे।स्वातंत्र्योत्तर काल में चंडीगढ पहला ऐसा शहर बसाया गया जो मुहल्लो मे नहीं सेक्टरो मे बॅटा था। पं.जवाहर लाल नेहरू की मिश्रित अर्थव्यवस्था के तहत बोकारो,हटिया, भिलाई,राउरकेला जैसे शहर बनाए गए,बसाए गए।नेहरू इन नए शहरो को गर्व से  आधुनिक मंदिर कहते थे।पिछले तीन दशको मे आधुनिकता के नए दौर में भी दिल्ली के आसपास गुडगाॅव, नोएडा,मुॅबई के पास नई मुॅबई बस गई या फिर बसाई गई लेकिन कभी भी शहर का बसना या बसाया जाना राजनीति के केन्द्र मे नही रहा। लेकिन नरेन्द्र मोदीजी ने 2014 के लोकसभा चुनाव से एक वर्ष पहले से ही वादा करना शुरू कर दिया था कि गुजरात माॅडल का आर्थिक विकास के माॅडल का विस्तार राष्ट्रीय स्तर पर किया जाएगा और इसके महत्वपूर्ण चरण में 100 स्मार्ट सिटी की स्थापना की जाएगी।मोदीजी को एक नए आर्थिक विकास का प्रणेता मानने वाले आशावादियो,जिसमें अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी शामिल है,की अपेक्षा रही है कि इन शहरों में स्तरीय चिकित्सा एवं शिक्षा व्यवस्था होगी,घर,मकान,गलियो और सडको की उचित व्यवस्था होगी। पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण के उचित प्रबंध होंगे।जल,थल और नभ यातायात के उचित व्यवस्था होगी।हर व्यक्ति हर परिवार कंप्यूटर,इंटरनेट, स्मार्टफोन जैसी आधुनिक संचार प्रणाली का अभ्यस्त होगा।हर व्यक्ति, हर परिवार की कुल श्रमशक्ति कौशल सक्षम होगी और अपनी जरूरत की पूर्ति हेतु वह अर्जन में सक्षम होगा।हर व्यक्ति,हर परिवार न सिर्फ वित्तीय रूप साक्षर बल्कि पर्याप्त सक्षम होगा। लेकिन आशंका व्यक्त करने वालो की भी कोई कमी नही है।उन्हे लगता है कि बार-बार आ रहा भूमि अधिग्रहण अध्यादेश और संभावित भूमिग्रहण कानून की जल्दबाजी ही इसलिए है कि सरकार अपनी शर्तो पर किसानों की जमीन अधिग्रहित कर कारपोरेट घरानो को उपलब्ध कराएगी।गगनचुंबी एपार्टमेंट और माॅल्स के निर्माण में,फ्लाईओवर और मल्टीलेन सडको के निर्माण मे कालाधन कुबेर रूपया में तीन अठन्नी बनाएॅगे।इन स्मार्ट सिटी में मेहनत मजदूरी कर रोज कमाने खाने वालो की कोई जगह नही होगी।यह ऐसे सफेदपोश लोगो की जलकुॅभी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करेगी जो जड से कट गए है लेकिन छायादार और फलदार वृक्ष नही हो सकते। लेकिन वर्तमान मोदी सरकार के एक वर्ष पूरे होने को आए सरकारने इस विषय पर तकरीबन मौन साध रखा था।अतः न तो आशावादियो की उम्मीदे फलीभूत हो रही थी और न आशंका से घिरे लोग उबर पा रहे थे।लम्बी चुप्पी के बाद सरकार ने मौन तोडा है और यह घोषणा हुई है कि 2015-16 में 20,2016-17में 40,2017-18 में 40 शहरो को स्मार्ट किया जाएगा।जिन 100 शहरों की सूची जारी की गई है उसमे कोई भी नया शहर नही है।इस देश के पैमाने से सभी पहले ही विकसित शहर है।अर्थात् पहले ही चरण में सरकार अपने वादे,अपनी घोषणा से पीछे हट गई है।वह 100 स्मार्ट सिटी बनाने या बसाने नही जा रही बल्कि 100 शहरो को स्मार्ट करने जा रही है।एक अपुष्ट सूचना के अनुसार इस मद में इन तीन वर्षो में 48000 करोड खर्च किए जाएॅगे अर्थात् प्रति शहर औसत 480करोड सरकार खर्च करेगी। 1985 मे ही तत्कालीन प्रधान मंत्री स्व. राजीव गाॅधी ने स्वीकार किया था कि सरकार द्वारा खर्च किए गए प्रत्येक रूपये में 85 पैसे भ्रष्टाचार की भेंट चढ जाता है,वास्तविक परिणाम 15 पैसे का ही दृष्टिगोचर होता है।इस पैमाने पर प्रत्येक शहर पर औसत खर्च किए जाने वाले 480 करोड मे से बमुश्किल 72 करोड के परिणाम दृष्टिगोचर होंगे।लेकिन इतने पैसो मे तो किसी शहर मे ढंग का एक माॅल नहीं बन सकता।

Tuesday, 5 May 2015

स्मार्ट सिटी पर एक विचारोत्तेजक लेख पत्रकार विष्णु गुप्त का

राष्ट्र चिंतन
 गले की फांस बनेगी स्मार्ट सिटी ?
किसके लिए होगी स्मार्ट सिटी?

      विष्णुगुप्त

‘स्मार्ट सिटी‘ को लेकर अनेकानेक जिज्ञासाएं हैं, अनेकानेक प्रश्न है, अनेकानेक दिलचस्पियां है, अनेकानेक आशांकाएं हैं, अनेकानेक खुशफहमियां हैं, अनेकानेक प्रचार मिथ हैं? जैसे स्मार्ट सिटी किसके लिए होगी, स्मार्ट सिटी किसके लिए नहीं होगी, स्मार्ट सिटी किसका विकास करेगी, स्मार्ट सिटी किसका विकास रोकेगी, स्मार्ट सिटी किसके सपने पूरे करेगी,स्मार्ट सिटी किसके सपने उजारेगी, स्मार्ट सिटी  क्या पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देगी, स्पार्ट सिटी क्या पर्यावरण विध्वंस का प्रतीक बनेगी, क्या स्मार्ट सिटी में हाशिये पर खड़े  और आत्महत्या के लिए मजबूर व बाध्य हो रहे किसानों के लिए भी कोई जगह होगी, स्मार्ट सिटी क्या सिर्फ सूटबूट वालों के लिए होगी या फिर स्पार्ट सिटी में ग्रामीण व कस्बों के बैरोजगार युवकों के लिए भी होगी, स्मार्ट सिटी क्या अडानी-अंबानी जैसे आर्थिक सामंतों की तिजोरी भरने वाली होगी, स्मार्ट सिटी क्या मजदूरों को शरण देगी, स्मार्ट सिटी क्या नरेन्द्र मोदी की किस्मत चमकायेगी या फिर नरेन्द्र मोदी के गले की फांस बनेगी? ये सभी प्रश्न हमारे जैसे देश के लाखों जिज्ञासुओं का है। पर नरेन्द्र मोदी सरकार कहती है कि स्पार्ट सिटी विकास व उन्नति के नये पायदान बनायेगी, बैरोजगारी दूर करेगी, पर्यावरण संरक्षण करेगी, एक ही स्थान पर सभी जरूरी उपयोगी संसाधन उपलब्ध होगा, भारत दुनिया के सबसे चमकीले शहरों वाला देश होगा, स्मार्ट सिटी राष्टीय आर्थिक ग्रोथ का अगुवा बनेगी?
ड्रीम स्मार्ट सिटी के प्रशंसक कौन-कौन हैं? सच तो यह है कि मोदी के ड्रीम स्मार्ट सिटी की प्रशंसा देश की सीमा से बाहर भी हो रही है और ड्रीम स्मार्ट सिटी की सफलता की प्रत्याशा में पूरी दुनिया है। दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के राष्टपति बराक ओबामा तक ड्रीम स्मार्ट सिटी के प्रशंसक हैं। बराक ओबामा ने टाइम मैग्जीन में लिखे लेख में नरेन्द्र मोदी को आर्थिक सुधारों का अगुआ बताया है। बराक ओबामा की इस धारणा के पीछे ड्रीम स्मार्ट सिटी जैसी परियोजनाएं हैं जो नरेन्द्र मोदी के एजेंटे में शामिल हैं। डीम स्मार्ट सिटी के प्रशंसक और पैरोकार दुनिया भर के कारपोरेट घराने व हस्तियां हैं,दुनिया भर के प्रोफेशनल हैं, दुनिया भर के बड़े-बडे निवेशक हैं जिन्हें स्मार्ट सिटी में निवेश से पूंजी दोगुनी-चार गुनी होनी की उम्मीद है। ड्रीम स्मार्ट सिटी के प्रशंसक और पैरोकार देशी-विदेश औद्योगिक घराने हैं जिन्हें स्मार्ट सिटी परियोजना का लाभार्थी बनने की उम्मीद है। ड्रीम स्मार्ट सिटी के प्रशंसक और पैरोकार रियल स्टेट व अन्य निर्माण क्षेत्र की कंपनियां हैं जिन्हें ड्रीम स्मार्ट सिटी परियोजना में भागीदारी मिलने की उम्मीद है। ड्रीम स्मार्ट सिटी के पैरोकार वैसे लोग हैं जिनके पास अपार पैसा है, ब्लैक मनी है जो उसमें निवेश कर अपने लिए आलीशान, अति आधुनिक और सुविधाओं से लैश कार्यालय व आवासीय सुविधा हासिल कर सकते हैं।
स्मार्ट सिटी परियोजना के विरोधी कौन-कौन लोग होंगे? डीम स्मार्ट सिटी परियोजना का सबसे ज्यादा विरोधी किसान ही होंगे। आखिर क्यों? इसलिए कि स्मार्ट सिटी परियोजना में जमीन तो किसान व मजदूरों की ही जायेगी? स्मार्ट सिटी परिजयोना के लिए जमीन चाहिए, स्मार्ट सिटी तो आसमान में बनेगी नहीं, बनेगी तो जमीन पर ही। एक-एक स्मार्ट सिटी के लिए कोई एक -दो एकड़ भूमि नहीं बल्कि हजारों-लाखों एकड़ भूमि चाहिए। स्मार्ट सिटी कोई घने और दुरूह जंगलों के बीच तो बनेगी नहीं। घने जंगलों और दुरूह इलाको में स्मार्ट सिटी बनेगी तो वहां जायेगा कौन है और दुनिया की आधुनिक सुविधाओं का जाल बिछेगा तो कैसे? स्मार्ट सिटी बड़े शहरों के आजू-बाजू या फिर अति सुगम वाले क्षेत्रों में ही बनेगी। बड़े शहरों के किनारे जो गांव है और जो किसान हैं उनकी जमीन सीधे तौर पर लूटी जायेगी, फलस्वरूप् किसान की आजीविका मारी जायेगी। मुआबजा कितना मिलेगा, कब मिलेगा, मुआबजा राशि प्रभावित परिवारों की जीविका कितने दिनों तक खीचेगी? यह कहना मुश्किल है।
स्मार्ट सिटी की अवधारणा क्या है और स्मार्ट सिटी की अवधारणा कहां से आयी है तथा किस सोच व किस उद्देश्य से आयी है। स्मार्ट सिटी की अवधारण एक पश्चिमी सोच से निकली हुई है, अमेरिका यूरोप से आयी हुई है। स्मार्ट सिटी की अवधारणा पिछली सदी के नब्बे के दशक में आयी थी। इस अवधारणा के जनक डेविड बाॅलियर थे जिन्होंने शहरों को व्यवस्थित ढंग से और सुविधाओं से लैश कर बसाने का विचार दिया था। 2002 में रार्बट काॅडवेल ने अमेरिकी शहर पोर्टलैड को स्मार्ट सिटी ग्रोथ के रूप में प्रस्तुत किया था। पर दुूनिया यह नहीं जानती कि अमेरिकी शहर पोर्टलैंड सही मायने में स्मार्ट है और वह न्यूयार्क, लंदन, सिडनी, टोक्यों से भी चमकीला है। दुनिया में आज एक भी स्मार्ट सिटी की अवधारणा वाली सिटी नहीं है जो औद्योगिक दृष्टिवाले शहर जैसे मैनचेस्टर और शंघाई को मात देती है या फिर सुख-सुविधाओं से लैश न्यूयार्क,टोक्यों, लंदन, सिडनी और दुबई को चुनौती देती है। हमारे देश में सबसे व्यवस्थित शहर चंडीगढ़ बसा हुआ है। पर चडीगढ़ शहर की कल्पना और विस्तार का शुद्ध अवधारणा प्रशासकीय सुविधाओं का विस्तार और व्यवस्थित करना था, औद्योगिक दृष्टि-कारपोरेट दृष्टि कदापि नहीं थी। राष्ट्रीय ग्रोथ की सोच भी इसमें शामिल नहीं थी। चंडीगढ़ शहर आज भी आम आदमी का शहर नहीं है। चंडीगढ़ में बडे धनासेठों और धनपशुओं को ही सम्मान और आश्रय देता है।
नरेन्द्र मोदी की स्मार्ट सिटी कैसी होगी? इस पर भी अभी तक कोई स्पष्ट रूप-रेखा सामने नहीं आयी है। पर यह प्रचारित किया गया है कि एक ऐसा शहर जो उर्जा और जल का खपत कम करता हो, रोजगार देता हो, सभी नागरिक सुविधाएं प्रदान करता हो, शिक्षा-स्वास्थ्य की सुविधाएं अगल-बगल में ही होनी चाहिए, पूरा तंत्र कपंयूटर आधारित होना चाहिए। सबसे बड़ा सपना पर्यावरण संरक्षण का दिखाया जा रहा है। स्मार्ट सिटी से पर्यावरण संरक्षण कैसे होगा यह समझ से बाहर है। स्मार्ट सिटी बनाने में कितना पर्यावरण विध्वंस होगा, इसकी कल्पना तक नहीं हो सकती है। स्मार्ट सिटी परियोजना को पूरा करने के लिए पत्थर, सीमेट, ईंट, अलकतरा, लोहा के खपत होंगे, क्या इन्हें बनाने में पर्यावरण नष्ट नहीं होता है? स्मार्ट सिटी को विकसित करने के लिए खेतों की हरियाली की बलि चढ़ायी जायेगी, हजारों-लाखों पेड़ कटेंगे। विचारणीय विषय यह भी है कि स्मार्ट सिटी में उर्जा और जल का कम खपत कैसे संभव होगा? ठंड और गर्मी दोनों परिस्थितियों में एयरकंडिशन की सुविधा चाहिए। एयरकंडिशन की सुविधा के बिना स्मार्ट सिटी में कौन सा प्रोफेशनल रहेगा? करोड़ों-अरबों निवेश कर अपना कार्यालय, अपना आवास बनाने वाला धनपशु से आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं वह संयमित -नियंत्रित जीवन जीये। आधुनिक जमाने में पैसा खर्च करने वाला व्यक्ति आराम, उपभोग, लाभार्थी होने की इच्छा रखता है। ऐसे लोगों के लिए मौज मस्ती के साथ ही साथ पूंजी निवेश का अधिकतम लाभ चाहिए। ऐसी स्थिति में कितना पर्यावरण नष्ट होगा, कितना उर्जा व जल का विनाश होगा उसका आप अंदाजा लगा सकता हैं। स्मार्ट सिटी के सपने में यह उम्मीद की जा रही है कि गांधी की तरह लोग नियंत्रित और कम खपत मे जिंदगी गुजारे? इस खुशफहमी की हवा आज न कल तो निकलनी ही है।
स्मार्ट सिटी में कोई रिक्शा वाला नहीं होगा, स्मार्ट सिटी में कोई आटोवाला नहीं होगा, कोई मजदूर अपनी झुग्गियां नहीं लगा सकता है, कोई मजदूर और आम-आदमी सड़कों की पटरियों पर सो नहीं सकता है, अपना आशियाना डाल नहीं सकता है? स्मार्ट सिटी में अगर रिक्शावाला होगा, आटोवाला होगा, मजदूरों-आम आदमी का आशियाना होगा तो वह फिर स्मार्ट सिटी कैसे रहेगी, फिर वह सिटी तो पटना, अमृतशहर, भोपाल, कोलकाता जैसी ही हो जायेगी। स्मार्ट सिटी में मजदूर तो होंगे पर उसका आशियाना स्मार्ट सिटी की परिधि से दर्जनों किलोमीटर दूर होगा। स्मार्ट सिटी में उच्चे दर्जे के शिक्षार्थी ही लाभार्थी होंगे, कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए कोई जगह कहां होगी। गांव-कस्बे के गरीब अभिभावक लाखों रूपये देकर आज की आधुनिक शिक्षा बच्चों को दिला पाते कहां हैं? यह बात स्मार्ट सिटी की अवधारणा वालो को कहां समझ में आयेगी।
         स्मार्ट सिटी नरेन्द्र मोदी का चुनावी डीम योजना है।  पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान नरेन्द्र मोदी ने चुनाव जीतने के लिए जनता से 100 नये स्मार्ट सिटी बनाने का वायदा किया था। वायदे को पूरा करने के लिए अब नरेन्द्र मोदी ने कदम भी उठा दिये हैं। 100 नये स्मार्ट सिटी बनाने के लिए नरेन्द्र मोदी मंत्रिमंडल ने 48 हजार करोड़ रूपये भी स्वीकृत कर दिये हैं। नरेन्द्र मोदी के पांच साल के कार्यकाल का पहला वर्ष लगभग पूरा होने वाला है, अगले चार साल में एक सौ स्मार्ट सिटी बन कर तैयार हो जायेंगी, यह कहना मुश्किल है। अगर यह कामयाबी हासिल हो सकती है तो फिर नरेन्द्र मोदी अनुकरणीय इतिहास बना सकते हैं अगर नाकामयाबी मिलती है तो उनका राजनीतिक भविष्य भी अंधकारमय हो सकता है या फिर 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की तरह गर्त में जा सकता है। स्मार्ट सिटी को लेकर जनता और राजनीतिक दलों का बंवडर भी देखना शेष है।

Saturday, 2 May 2015

राम राज्य पर प्रश्न और उत्तर

राम राज्य पर प्रश्नोत्तर

सुराज के मॉडल में राम-राज्य का जिक्र आने पर कई तरह के प्रश्न किये जाते हैं, जिनका जवाब देना उचित होगा. नीचे हैं ये प्रश्नोत्तर.

प्रश्न : रामराज्य का जिक्र क्यों? क्या हम देश को राजतंत्र की और ले जाना चाहते हैं?
उत्तर : ऎसी कोई मंशा नहीं है. मगर कोई भी तंत्र हो, एक आदर्श राज्य में, आदर्श शासन में, वे लक्षण होने चाहिए जो राम के राज्य में थे, राम के शासन में थे. यों भारत में शासकों और राजाओं की एक लम्बी परम्परा रही है जो अपनी भावना और कार्यप्रणाली में नितांत प्रजातांत्रिक थे, जिनका जीवन प्रजा के कल्याण के लिए समर्पित था. राम उनमें से सर्वोत्तम थे मगर अकेले नहीं. इंग्लैण्ड में अभी भी रानी है, और इसलिए वहाँ  एक अर्थ में राजतंत्र है, मगर वह एक प्रजातांत्रिक देश है. लेकिन अब राजतंत्र की कोई आवश्यकता नहीं है. चुनावी प्रजातंत्र के भीतर ही प्रजा का  आदर करने वाला और प्रजा के दुःख दूर करने के लिए समर्पित शासन लाने की जरूरत है.

प्रश्न : रामराज्य का जिक्र इस संगठन को हिंदुत्व की और ले जाता दिखता है, और एक सेक्युलर राज्य में ऐसा नहीं होना चाहिए. सभी धर्मों पर सामान दबाव होना चाहिए.
उत्तर :  सेक्युलर राज्य का अर्थ होता है वैसा राज्य जहां राज्य की नीतियाँ किसी  एक धर्म-विशेष के निर्देशों के अनुकूल नहीं बनायीं जाएँ, बल्कि युक्तिसंगत और रैशनल सिद्धांतों के अनुकूल राज्य का संचालन हो. सुराज दल भी ऎसी ही व्यवस्था के पक्ष में है, जहाँ सभी धर्मों के प्रति सम्मान का भाव हो और समानता का व्यवहार हो. राम एक राजा थे, जिनका व्यक्तिगत चरित्र और शासन दुनिया भर में अनोखा और बढ़िया माना जाता है, इसीलिए उनके राज्य का आदर्श सामने रखा गया है. एक आदर्श शासक किस धर्म का था यह देखना गैरजरूरी है.

प्रश्न : मगर राम ही क्यों? दूसरे धर्म के अनुयायी किसी राजा का राज्य आदर्श के रूप में क्यों नहीं सामने रखा गया?
उत्तर : दुनिया में कहीं ऐसे किसी राजा या राजा के शासन का उदाहरण सामने नहीं आया. अगर हो तो बताएँ, और उसका वर्णन  दिखाएँ. अगर मान भी लें कि दूर देश में कहीं कभी ऐसा कोई शासन हुआ था तो भी  हम अपने देश के उदाहरण छोड़ कर दूर देशों में क्यों जायें? हमें तो पहले उन्हीं का उदाहरण पेश करना चाहिए, जिसे हमारे देश की अधिकांश जनता जानती और आदर करती हो.

प्रश्न : मगर राम तो एक  ‘मिथकीय’ चरित्र हैं, ऐतिहासिक चरित्र नहीं!
उत्तर : यह आपने कैसे निर्णय कर लिया? एक महान ऐतिहासिक चरित्र के चारों और कुछ मिथक भी उग आते हैं, यह अलग बात है. अयोध्या से श्रीलंका तक हर जगह उनकी यात्रा की स्मृतियाँ हैं, चिह्न हैं. मगर यदि वे मिथकीय चरित्र भी होते तो भी उनका उदाहरण, उनके शासन का उदाहरण, जैसा कि अनेकों  कवियों के महाकाव्यों में मिलता  है, भारत के घर-घर में जाना जाता है. यह उदाहरण इस देश की जनता को तुरंत समझ में आ जाएगा. राम अगर मिथक हैं तो आप दुनिया के किसी देश में एक ऐसे मिथकीय आदर्श राजा का उदाहरण दिखा दीजिये, जिसका चरित्र इतना उन्नत हो और जिसके चरित्र को देश की हर भाषा में कवियों ने अपने-अपने राज्यों में जनता तक पहँचाया हो!

प्रश्न : मगर राम के उदाहरण से दूसरे कुछ धर्मों के लोग बुरा मान सकते हैं.

उत्तर : समझदार लोग बुरा नहीं मानेंगे, और नहीं मानते. जो समझदार नहीं हैं उन्हें समझाना पडेगा. जिन्ना ने पकिस्तान का राष्ट्रगीत एक हिन्दू से क्यों लिखवाया? उस समय जिन्हें जिन्ना ने इसके लिए सबसे उपयुक्त पाया उससे लिखवाया! मोहम्मद इकबाल का लिखा देश-गीत ‘सारे जहाँ से अच्छा’ सारे देश भर में बच्चे गाते हैं. तो क्या हम उसे गाना सिर्फ इस लिए छोड़ दें क्योंकि उसे एक मुसलमान ने लिखा? हिन्दुस्तान की तारीफ़ में लिखे गए सबसे सुन्दर गीतों में से वह एक है. बेहतर शासन के उदाहरण के रूप में हम अकबर को सिर्फ इसलिए दरकिनार कर दें क्योंकि यह दूसरे समुदाय के लोगों को नहीं भायेगा? हिन्दू पूरे भारत  में बुद्ध को ‘भगवान’ बुद्ध कहते हैं जब कि बौद्ध धर्म हिन्दू धर्म से अलग खडा हुआ, क्योंकि वुद्ध उस योग्य थे. अगर अंगरेजी अधिक पढ़े हुए लोग राम को सिर्फ इसलिए किनारे रखना चाहे हैं  क्योंकि वे हिन्दू थे तो इसका अर्थ यही है कि उनके अन्दर समझदारी और आत्मसम्मान दोनों की कमी है, या वे अति भीरु हैं. भीरुता हमारा राष्ट्रीय स्वभाव बन गयी है. इससे हमें मुक्त होना है. जहाँ जो अच्छा है उसे सभी को स्वीकार करना चाहिए. राम की कहानी सभी को पढ़नी चाहिए. वे पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण और आदर्श हैं. सभी समुदायों के महान लोगों का आदर सभी समुदाय के लोगों को निष्पक्ष हो कर करना चाहिए. यही उचित है. अन्यथा यह संकीर्णता है, और सेक्युलरिज्म का अनादर है.

Tuesday, 28 April 2015

रामराज्य में हरितक्रान्ति, श्वेतक्रान्ति और गृहउद्योग - भाग ९

लता बिटप मागें मधु चवहीं | मनभावतो धेनु पय श्रवहीं ||
ससी संपन्न सदा रह धरणी | त्रेता भइ कृतजुग कै करनी ||

साधारण अर्थ : बेलें और वृक्ष माँगने से ही मधु टपका देते हैं. गौएं मनचाहा दूध देती हैं. धरती सदा खेती से भरी रहती है. त्रेता में सतयुग की करनी (स्थिति) हो गयी.


विशेष टिपण्णी : ‘ससी संपन्न सदा रह धरणी’ से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि हरितक्रान्ति हो चुकी है, और खेतों में कई फसलें ली जाती हैं – तभी तो धरती हमेशा फसलों से भरी रहती है! ‘गायें मनचाहा दूध देती हैं’ श्वेत क्रान्ति की और संकेत करता है! ‘लता बिटप मागें मधु चवहीं’ यह संकेत करता है कि मधुमक्खियों का पालन हर दूसरे वृक्ष पर हो रहा है, आर्थात लधु और गृह-उद्योगों का जाल रामराज्य में बिछा हुआ है. कृषि, पशुपालन और लघु उद्योग में ही अभी भी भारत की समृद्धि के सूत्र छिपे हुए हैं. 

Sunday, 26 April 2015

Ram Rajya Part 8

फूलहिं फरहि सदा तरु कानन | रहहिं एक सँग गज पंचानन |
खग मृग सहज बयरु बिसराई | सबन्हि परस्पर प्रीती बढ़ाई ||
साधारण अर्थ : वन में वृक्ष सदा फ्फलाते और फूलते हैं. हाथही और सिंह वैर भूल कर एक साथ रहते हैं. पक्षी और पशु सभी ने स्वाभाविक वैर भुला कर आपस में प्रेम बढ़ा लिया है.
विशेष टिपण्णी : वृक्ष जंगल और उद्यान सुरक्षित हैं तभी तो फूलते-फलते हैं. उन्हें कोई काट कर रामराज में नष्ट नहीं करता, नुकसान नहीं पहुँचाता – ‘फौरेस्ट प्रोटेक्शन’ कारगर है.

कूजहिं खग मृग नाना बृंदा | अभय चरहिं बन चरहिं अनंदा ||
सीतल सुरभि पवन बह मंदा |गुंजत अलि लै चलि मकरंदा ||
साधारण अर्थ : पक्षी कूजते हैं, भांति-भांति के पशुओं के समूह वन में निर्भय विचरते और आनंद करते हैं. शीतल मंद सुगन्धित पवन चलता रहता है. भंवरे पुष्पों का रस ले कर चलते हुए गुंजार कर्राते जाते हैं.

विशेष टिपण्णी : अहिंसा का सिद्धांत सिर्फ मनुष्यों पर लागू नहीं है, दया सिर्फ मनुष्यों तक सीमित नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों पर भी लागू है; तभी तो पशु बिना भय के जंगलों में विचरते हैं! यानी पशुओं को मनुष्यों से कूई भय नहीं है. हर जगह सुगन्धित फूलों के पेड़ लगे हुए हैं तभी तो हवाएं सुगंध ले कर चलती हैं और भंवरे गुंजार करते रहते हैं!

Saturday, 25 April 2015

विकास और क्रान्ति

विकास और क्रांति, समग्र या संपूर्ण क्रांति


आज ‘विकास, क्रान्ति, सम्पूर्ण क्रान्ति, समग्र क्रान्ति और व्यवस्था-परिवर्तन जैसे शब्द हवाओं में हैं। ये गम्भीर अर्थों वाले शब्द हैं, इसलिए जनमानस में इनके विषय में स्पष्टता और समझदारी विकसित होना जरूरी है। इन शब्दों के अर्थ पर सोच-विचार के क्रम में दूसरे भी अन्य सम्बन्धित विचारों पर सार्थक रोशनी पड़ सकती है
पहले हम यह समझने की कोशिश करें कि क्रान्ति (रेवोल्यूशन) क्या है और यह उद्विकास (एवोल्यूशन) और विकास (डेवलपमेंट) से कैसे अलग है

विकास की तरह क्रान्ति भी परिवर्तन है। लेकिन क्रान्ति त्वरित परिवर्तन है, तेजी से लाया गया परिवर्तन है। अगर देश ६० महीनों में वे उपलब्धियाँ हासिल कर लेता है जो ६० वर्षों में हासिल नहीं हो सकीं तो यह विकास कहलाएगा, लेकिन जो ६० वर्षों में नहीं हो सका और उसे ६० हफ्तों या उससे भी कम समय में कर दिखाया गया, तो यह होगी क्रान्ति
इसी तरह का फर्क उद्विकास और क्रान्ति के बीच होता है। इसलिए, क्रान्ति एक त्वरित परिवर्तन है। यह एक ऐसा परिवर्तन भी है जिसका व्यापक प्रभाव पड़ता है। लेकन चाहे क्रान्ति हो या विकास, यह परिवर्तन एक ऐसी दिशा में होना चाहिए जिसे लोग सकारात्मक या अच्छी दिशा मान सकें

जिस तरह से इतिहास की पुस्तकें तैयार की जाती हैं उनसे कुछ ऐसा लगता है कि जब भी इंसानी सभ्यता में एक अच्छी दिशा में कोई त्वरित और व्यापक परिवर्तन हुआ, यह हिंसक तरीकों से हुआ। १७७५-८३ के दौरान का अमेरिकी स्वाधीनता-आन्दोलन एक रक्त-रंजित आन्दोलन था। १७८७ और १७९९ के बीच हुई फ़्रांसीसी क्रान्ति भी हिंसा और खून-खराबे से लथपथ थी

१९१७ की रुसी क्रान्ति, उसके पहले और बाद के वर्ष, खून के छीटों से रंगे रहे। चीन ने जिस क्रान्तिकारी परिवर्तन द्वारा विश्व के पाँचवे हिस्से की जनसंख्या की नियति बदल डाली, उसमें भी खून की होलियाँ खेली गईं। ताज्जुब नहीं कि क्रान्ति शब्द अपने साथ हिंसा की बू लेकर चलता है। मगर अब हम एक नजर कुछ दूसरी महान क्रान्तियों पर डालें
 सन् १९०० में दुनिया में इंसान की औसत उम्र हजारों सालों से तीस साल या कम हुआ करती थी। लेकिन १९२६ में पेन्सीलीन की खोज के बाद, और चिकित्सा विज्ञान और स्वास्थ्य सेवाओं में प्रगति तथा अन्न की उपलब्धता की बढ़ोतरी के कारण इंसानों की उम्र कुछ ही दशकों में तेजी से बढ़ने लगी और १९८५ में यह ६२ साल हो गई थी। आज जन्म लेने वाले भारतीयों की औसत उम्र-आशा ६७ साल तथा यूरोप, अमेरिका और जापान में ८० साल के करीब हो गई। जो हजारों सालों में नहीं हो सका, वह कुछ दशकों में हो गया एक त्वरित, सकारात्मक और व्यापक परिवर्तन। यह एक महान क्रान्ति थी। एक गुपचुप क्रान्ति, जो हिंसा की कोख से नहीं उपजी बल्कि मानवीय मस्तिष्क की शक्तियों के प्रयोग और संगठित इंसानी प्रयासों के माध्यम से घटित हुई। इसी प्रकार औद्योगिक क्रान्ति हिंसा से नहीं हुई
उसके पीछे मनुष्य की सोच, अनुसन्धान, कड़ी मेहनत और उद्यमिता जैसे कारण थे। औद्योगिक क्रान्ति ने एकाएक योरोप का, और उसके साथ दुनिया का, नक्शा बदल दिया

हम देखेंगे कि कई क्षेत्रों में भारत में त्वरित क्रान्तियाँ हो सकती हैं। मगर हम ठहराव या धीमे विकास की गति से चल रहे हैं, और यह सब खामख्वाह, क्योंकि महज कुछ कानून और नीतियाँ बदलने से, व्यवस्था और प्रणालियाँ बदलने से, अलग-अलग क्षेत्रों में तत्काल क्रान्तियाँ आ सकती हैं। हौंग-कौंग के इंडिपेंडेंट कमिशन अगेंस्ट करप्शन जैसी स्वायत्त और धारदार संस्था राज्यों में बन जाए, केन्द्र में बन जाए, तो भ्रष्टाचार पर शीघ्र ही अंकुश लग जाए जैसा कि हौंग-कौंग में हुआ। एक अत्यन्त भ्रष्ट समाज इंडिपेंडेंट कमिशन अगेंस्ट करप्शन के गठित होते ही बहुत जल्दी भ्रष्टाचार मुक्त होने लगा। वहाँ एक क्रान्ति हो गई

कई लोग अभी भी यह कहने को उद्यत हो सकते हैं कि यह सब तो ठीक है, मगर राजनीतिक क्षेत्र में बिना हिंसा के कोई बड़ी क्रान्ति नहीं हो सकती, क्योंकि शासक और शोषक वर्ग शान्ति और सुलह से अपना चरित्र नहीं बदलता, स्थान नहीं छोड़ता। ऐसे लोगों को अभी कुछ दशकों पूर्व के महात्मा गाँधी के नेतृत्व में किए गए उस विराट अहिंसक संघर्ष को याद करना चाहिए जो हिन्दुस्तान की जनता ने अंगरेजों के विरुद्ध छेड़ा।  राजनीतिक परिवर्तनों के लिए निश्चय ही संघर्ष की जरूरत पड़ती है, और पड़ेगी, कभी-कभी तो तीव्र और लम्बे संघर्ष की, लेकिन जरूरी नहीं कि ये संघर्ष हिंसक हों
आज जब भारत स्वतन्त्र है और जब हमारा अपना जनतन्त्र है, जब हम खुद ही अपना कानून बनाते हैं, खुद ही नीतियाँ बनाते हैं, तो ऐसे में क्रान्तिकारी व्यवस्था-परिवर्तन बिना हिंसा के क्यों नहीं हो सकते ? इसके लिए संघर्ष की जरूरत पड़ेगी, आन्दोलनों की जरूरत पड़ेगी, मगर उनके साथ पहले वैचारिक स्पष्टता की जरूरत पड़ेगी, चिन्तन और मनन की जरूरत पड़ेगी। ऐसे ही चिन्तन-मनन और जनसंघर्ष के कारण सूचना का अधिकार-जैसा क्रान्तिकारी कानून आ पाया और एक विशेष क्षेत्र में व्यवस्था-परिवर्तन हुआ। अर्थात क्रान्तिकारी व्यवस्था-परिवर्तन के लिए कारगर अहिंसक अस्त्र-शस्त्र देश में उपलब्ध हैं। सिर्फ उनका प्रयोग हमें सूझ-बूझ के साथ और दृढ़ निश्चय के साथ करना है

ये तो हुई बातें क्रान्ति की, हिंसक और अहिंसक क्रान्तियों की। अब हम आएँ समग्र या सम्पूर्ण क्रान्ति पर। समग्र क्रान्ति एक ऐसा त्वरित परिवर्तन है जो वैयक्तिक और सामाजिक जीवन के किसी एक क्षेत्र में नहीं बल्कि कई प्रमुख क्षेत्रों में एक साथ घटित होता है, जिनमें राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक संरचना, सामाजिक चेतना और इसी प्रकार अन्य सभी प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं। समग्र क्रान्ति बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों, स्त्रियों और पुरुषों, बच्चों और बुजुर्गों, उत्तर और दक्षिण, पूरब और पश्चिम सभी को क्रान्ति-चक्र में खींचती है
किसी भी परिवर्तन का हमारे ऊपर रचनात्मक प्रभाव पड़े इसके लिए जरूरी है कि उस परिवर्तन को इस प्रकार लाया जाए कि वह हमारे जीवन को असह्य न बना दे। बिना समुचित परिवर्तन-प्रबन्धन के कोई भी त्वरित परिवर्तन खतरनाक हो सकता है

एक सभ्यता को उसकी जड़ों से उखाड़ कर, उसके इतिहास से उखाड़कर, उसे पुष्पित-पल्लवित नहीं किया जा सकता। परिवर्तन की गति चाहे जितनी भी तेज हो, हमारी सभ्यता का वृक्ष चाहे जितनी भी तेजी से आसमान की ओर बढ़े, उसे अपनी जड़ों के ऊपर ही बढ़ना होगा


आर्मीनिया नर संहार के १०० वर्ष

राष्ट्र चिंतन
                 आर्मीनिया नरसंहार के सौ साल
    आर्मीनिया की आंच में मुस्लिम-      ईसाई सर्वश्रेष्ठता


हैवान को जवाब देने के हैवानित पर नहीं उतरना चाहिए। इसंान को इंसानियत कायम रखने में ही भलाई है। आर्मीनियाई नरसंहार या फिर मुस्लिम आतंकवाद को आधार बना कर यूरोप की मुस्लिम आबादी को घृणा व तिस्कार का पात्र नहीं बनाया जाना चाहिए। आर्मीनियाई नरसंहार की कसौटी पर ईसाई-मुस्लिम सर्वश्रेष्ठता की आंच भी खतरनाक है। ऐसी आंच से किसी की सर्वश्रेष्ठता हासिल नहीं हो सकती है। दुनिया को यही कोशिश करनी चाहिए कि यहूदी और आर्मीनियाई समुदाय की तरह भविष्य में और किसी अन्य समुदाय का नरसंहार व कत्लेआम की लोमहर्षक-अमानवीय घटनाएं नहीं घट सके। पर आर्मेनियाई नरसंहार की कसौटी पर मुस्लिम देशों में गैर मुस्लिम समुदाय का मानवाधिकार की रक्षा करने का प्रश्न शेष है।


         विष्णुगुप्त


अति वीभत्स, लोमहर्षक व अमानवीय आर्मीनिया नरसंहार की घटना के सौ साल पूरे हो गये। आर्मीनिया नरसंहार में करीब 15 लाख लोगों की हत्या हुई थी। 24 अप्रैल 1915 को तुर्की के आटोमन साम्राज्य ने राजधानी कास्टैटिनोपोल से दो सौ आर्मीनियाई समुदाय के लोगों को गिरफ्तार किया था और फिर आर्मीनियाई समुदाय के खिलाफ पूरे आटोमन सम्राज्य में सामूहिक हिंसा हुई थी, कत्लेआम के घटना हुई थी। संपन्न आर्मीनियाई किसी न किसी प्रकार अपनी जान बचाने के लिए निकटवर्ती ईरान-इराक भाग गये थे पर 15 लाख से अधिक अर्मीनियाई लोग अपनी जान गंवाने के लिए मजबूर हुए थे। प्रथम विश्व युद्ध के समय की इस घटना को कोई इतिहासकार मुस्लिम  समुदाय की बर्बर कारवाई व हिटलर जैसा घृणास्पद कत्लेआम मानता है तो कोई इतिहासकार इसे दुनिया पर मुस्लिम-ईसाई सर्वश्रेष्ठता की प्रतिद्वद्विता के चश्मे से देखता है। इतिहासकारों या समाजविज्ञानियों की कोइ्र्र भी धारणा क्यों न हों पर यह सत्य है कि आर्मीनियाई समुदाय पर भयानक,बर्बर हिंसा हुई थी और उनका समूल नष्ट करने की अमानवीय अभियान चलाया गया था और यह अभियान उस समय के आटोमन सम्राज्य की छत्रछाया में चला था। आधुनिक तुर्की पर आर्मीनियाई नरसंहार एक कलंक के तौर पर है। 
             आर्मीनियाई नरसंहार के सौ साल पूरे होने पर पूरे यूरोप मे आर्मीनियाई समुदाय के प्रति हमदर्मी दिखायी जा रही है, आर्मीनियाई नरसंहार से जुड़े तथ्यों व कहानियों को प्रदर्शित किया जा रहा है। वेटिकन पोप ने भी आर्मीनियाई समुदाय का हुआ नरसंहार को पिछली 20 वीं सदी का सबसे बड़ा नरसंहार करार दिया है और मानवता के प्रति घृणास्पद अपराध करार दिया है। वेटिकन चर्च के पोप के बयान के बाद एक तरफ तो तुर्की आग बबूला है तो दूसरी तरह यूरोप की मुस्लिम आबादी को घृणा, अपमान, तिरस्कार जैसे व्यवहार से गुजरना पड़ रहा है। यूरोप की मुस्लिम समुदाय पूर्व के मुस्लिम बर्बरता के इतिहास और वर्तमान में मुस्लिम आतंकवाद की मानसिकता को लेकर पहले से निशाने पर हैं। आर्मीनियाई नरसंहार के इतिहास को आधार बना कर मुस्लिम आबादी को घृणास्पद हथकंडों का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए। इतिहास से सबक लेने की जरूरत होती है, इतिहास की बूरी चीजों का अनुकरण करना या फिर बदले की भावना से ग्रसित होकर अपराध करने की स्वीकार्यता नहीं होनी चाहिए।
आधुनिक तुर्की के निर्माण में आर्मीनियाइ्र्र समुदाय की बड़ी भूमिका थी। आर्मीनियाई समुदाय ईसाई थे। उनकी उदारता सर्वश्रेष्ठ थी। मजहबी रूढ़ियों के वे सहचर नहीं थे। विज्ञान और कला में उनकी सर्वश्रेष्ठता थी। तुर्की में रेल का विकास, सड़क का विकास बाजार का विकास में आर्मीनियाई लोगों की बड़ी भूमिका थी। उन्नीसर्वी सदी में तुर्की के एस्कीशेहिर और वाॅन, दो ऐसे शहर थे जिसे हम संघाई का दर्जा दे सकते हैं। जिस तरह चीन का संघाई पूरी दुनिया में अपने औद्योगिक उत्पादन के लिए आज मशहूर है जिसके आधार पर चीन की अर्थव्यवस्था टिकी हुई है उसी तरह से उस समय आधुनिक तुर्की का एस्कीशेहिर और वाॅन प्रमुख औद्योगिक शहर थे। एस्कीशेहिर और वाॅन शहर से पूरा यूरोप कलात्मक वस्तुए खरीदता था। यूरोप की व्यापारिक जरूरतों को पूरा करने के कारण एस्कीशेहिर और वाॅन शहर ज्ञान-विज्ञान का भी केन्द्र था। उस काल में एस्किीशेहिर और वाॅन सहित जितने भी शहर थे सभी पर अर्मीनियाई समुदाय का आधिपत्य था। आर्मीनियाई समुदाय की विशेषता यह भी थी कि वे मजहबी रूढ़ियों को आधार बना कर मजहब के प्रचार-प्रसार के विरोधी थे।
 यूरोप और अरब के बीच में होने के कारण तुर्की पर दो संस्कृतियों की छाप थी। एक अरब की रूढ़ियों से ग्रसित संस्कृति और दूसरी यूरापे की खुलापन की संस्कृति, जिसे हम उपयोग-उपभोग की संस्कृति भी कह सकते हैं। पर प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व ही तुर्की को अरब की रूढियों वाली संस्कृति ने कब्जे में ले लिया था, जिसमें कट्टरता भी थी, हिंसा भी थी और एकात्मक सर्वश्रेष्ठता की मानसिकता थी। जब किसी भी संस्कृति के अंदर में कट्टरता, हिंसा और एकात्मकता की सर्वश्रेष्ठता की मानसिकता रचती-बसती है और खतरनाक तौर पर प्रसार पाती है तो उसके परिणामों की कल्पना की जा सकती है। तुर्की में भी कुछ ऐसा ही हुआ। अरब की रूढ़ियों वाली कट्टरता, हिंसा, और एकात्मक सर्वश्रेष्ठता के खूनी पंजे जैसे ही तुर्की को चपेट मे लिये वैसे ही तुर्की यूरोप की उदारता व खूलेपन की संस्कृति का प्रभाव समाप्त हो गया। मुस्लिम सर्वश्रेष्ठता की आंच धधकने लगी। आर्मीनियाई समुदाय के सामने सिर्फ मुस्लिम होने या फिर तुर्की छोड़ कर भागने का विकल्प था। मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ आटोमन सम्राज्य भी खड़ा था। परिणाम यह हुआ कि जो आर्मीनियाई समुदाय के लोग सक्षम थे वे यूरोप या फिर पडोसी ईरान-इराक में पलायन कर गये पर जो पलायन नहीं कर सके, उसके हिस्से में मुस्लिम कट्टरपंथियो और आॅटोमन सम्राज्य के हाथों मौत आयी।
आर्मीनियाई नरसंहार के सौ साल हो गये पर मुस्लिम देशों में गैर मुस्लिम समुदाय के प्रति सोच में कोई परिवर्तन नहीं आया है। मिश्र में कई लाखों ईसाइयों को देश छोड़ने के लिए बाध्य किया गया, सूडान, नाइजीरिया, सोमालिया सहित दर्जनों अफ्रीकी देशों में मुस्लिम आतंकवादी संगठन ईसाइयों पर नरसंहार के दौर चला रखे हैं। बोको हरम जैसे आतंकवादी संगठन ने हजारों ईसाई लडकियों को कैसे बंधक और उपभोग की वस्तू बनाया है, यह भी जगजाहिर है। आईएस जैसे मुस्लिम आतंकवादी संगठन यजीदी महिलाओं के साथ किस प्रकार के व्यवहार कर रहे हैं, यह सब दुनिया के लिए चिंता का विषय है। मुस्लिम बहुल देशों में गैर मुस्लिम समुदाय डर-भय और हिंसा में जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर होते हैं।
आर्मीनियाई समुदाय का आक्रोश है कि जिस प्रकार से दुनिया ने यहूदी नरसंहार के खिलाफ आवाज उठायी है उस प्रकार से आर्मीनियाई नरसंहार की आवाज नहीं उठायी गयी है। यह सही बात है कि दुनिया यहूदी नरसंहार की बात तो स्पष्ट तौर पर जानती है पर आर्मीनियाई नरसंहार की बात कम ही जानती है। अगर वेटिकन के पोप ने आर्मीनियाई नरसंहार की बात को न उठाते तो दुनिया का आम-आदमी को शयद ही पता होता कि आर्मीनियाई नरसंहार के सौ साल हो गये। जहां तक यहूदी नरसंहार की बात है तो पूरी दुनिया ने यहूदियों के जख्मों पर मल्हम लगाया है, यहूदियों को इजरायल के रूप में एक अलग देश मिला है। यहूदी आज पूरी दुनिया में अपनी उपलब्धि व हुनर का लौहा मनवा रहे हैं। पर यहूदियों की तुलना आमीनियाई समुदाय पर दुनिया ने नहीं के बराबर ध्यान दिया हैं। आर्मीनियाई समुदाय की तुर्की में जो संस्कृति थी, आर्मीनियाई समुदाय के जो अवशेष थे उसको भी जमींदोज कर दिया गया। जबकि जरूरत आर्मीनियाई समुदाय के अवशेष को संरक्षित रखने की थी। इसलिए कि आनेवाली पीढ़ियों को दिखाया-समझाया जा सके कि मजहबी घृणा कितनी खतरनाक होती है, कितनी अमानवीय होती है। मानवता के लिए सभी प्रकार की मजहबी घृणएं अमान्य होनी चाहिए।
तुर्की आज खुद मोहम्मद कमाल पाशा के सिद्धांतों की कब्र पर बैठा हुआ है। तुर्की आज पूरी तरह से मजहबी रूढ़ियों और विसंगतियों के कैद में खड़ा है। शासन के कई कानूनों पर मजहबी रंग चढ़ाया गया है। यही कारण है कि यूरोपीय यूनियन ने तुर्की को सदस्यता प्रदान करने से इनकार कर दिया था। तुर्की इस बात का जवाब नहीं देता है कि आर्मीनियाई समुदाय के कला, विज्ञान और व्यापार के अवशेषों का संग्रहित-संरक्षित कर क्यों नहीं रखा गया।
बदले की भावना खतरनाक होती है। हैवान को जवाब देने के हैवानित पर नहीं उतरना चाहिए। इसंान को इंसानियत कायम रखने में ही भलाई है। आर्मीनियाई नरसंहार या फिर मुस्लिम आतंकवाद को आधार बना कर यूरोप की मुस्लिम आबादी को घृणा व तिस्कार का पात्र नहीं बनाया जाना चाहिए। आर्मीनियाई नरसंहार की कसौटी पर ईसाई-मुस्लिम सर्वश्रेष्ठता की आंच भी खतरनाक है। ऐसी आंच से किसी की सर्वश्रेष्ठता हासिल नहीं हो सकती है। दुनिया को यही कोशिश करनी चाहिए कि यहूदी और आर्मीनियाई समुदाय की तरह भविष्य में और किसी अन्य समुदाय का नरसंहार व कत्लेआम की लोमहर्षक-अमानवीय घटनाएं नहीं घट सके। पर आर्मेनियाई नरसंहार की कसौटी पर मुस्लिम देशों में गैर मुस्लिम समुदाय का मानवाधिकार की रक्षा करने का प्रश्न शेष है।