Saturday, 25 April 2015

आर्मीनिया नर संहार के १०० वर्ष

राष्ट्र चिंतन
                 आर्मीनिया नरसंहार के सौ साल
    आर्मीनिया की आंच में मुस्लिम-      ईसाई सर्वश्रेष्ठता


हैवान को जवाब देने के हैवानित पर नहीं उतरना चाहिए। इसंान को इंसानियत कायम रखने में ही भलाई है। आर्मीनियाई नरसंहार या फिर मुस्लिम आतंकवाद को आधार बना कर यूरोप की मुस्लिम आबादी को घृणा व तिस्कार का पात्र नहीं बनाया जाना चाहिए। आर्मीनियाई नरसंहार की कसौटी पर ईसाई-मुस्लिम सर्वश्रेष्ठता की आंच भी खतरनाक है। ऐसी आंच से किसी की सर्वश्रेष्ठता हासिल नहीं हो सकती है। दुनिया को यही कोशिश करनी चाहिए कि यहूदी और आर्मीनियाई समुदाय की तरह भविष्य में और किसी अन्य समुदाय का नरसंहार व कत्लेआम की लोमहर्षक-अमानवीय घटनाएं नहीं घट सके। पर आर्मेनियाई नरसंहार की कसौटी पर मुस्लिम देशों में गैर मुस्लिम समुदाय का मानवाधिकार की रक्षा करने का प्रश्न शेष है।


         विष्णुगुप्त


अति वीभत्स, लोमहर्षक व अमानवीय आर्मीनिया नरसंहार की घटना के सौ साल पूरे हो गये। आर्मीनिया नरसंहार में करीब 15 लाख लोगों की हत्या हुई थी। 24 अप्रैल 1915 को तुर्की के आटोमन साम्राज्य ने राजधानी कास्टैटिनोपोल से दो सौ आर्मीनियाई समुदाय के लोगों को गिरफ्तार किया था और फिर आर्मीनियाई समुदाय के खिलाफ पूरे आटोमन सम्राज्य में सामूहिक हिंसा हुई थी, कत्लेआम के घटना हुई थी। संपन्न आर्मीनियाई किसी न किसी प्रकार अपनी जान बचाने के लिए निकटवर्ती ईरान-इराक भाग गये थे पर 15 लाख से अधिक अर्मीनियाई लोग अपनी जान गंवाने के लिए मजबूर हुए थे। प्रथम विश्व युद्ध के समय की इस घटना को कोई इतिहासकार मुस्लिम  समुदाय की बर्बर कारवाई व हिटलर जैसा घृणास्पद कत्लेआम मानता है तो कोई इतिहासकार इसे दुनिया पर मुस्लिम-ईसाई सर्वश्रेष्ठता की प्रतिद्वद्विता के चश्मे से देखता है। इतिहासकारों या समाजविज्ञानियों की कोइ्र्र भी धारणा क्यों न हों पर यह सत्य है कि आर्मीनियाई समुदाय पर भयानक,बर्बर हिंसा हुई थी और उनका समूल नष्ट करने की अमानवीय अभियान चलाया गया था और यह अभियान उस समय के आटोमन सम्राज्य की छत्रछाया में चला था। आधुनिक तुर्की पर आर्मीनियाई नरसंहार एक कलंक के तौर पर है। 
             आर्मीनियाई नरसंहार के सौ साल पूरे होने पर पूरे यूरोप मे आर्मीनियाई समुदाय के प्रति हमदर्मी दिखायी जा रही है, आर्मीनियाई नरसंहार से जुड़े तथ्यों व कहानियों को प्रदर्शित किया जा रहा है। वेटिकन पोप ने भी आर्मीनियाई समुदाय का हुआ नरसंहार को पिछली 20 वीं सदी का सबसे बड़ा नरसंहार करार दिया है और मानवता के प्रति घृणास्पद अपराध करार दिया है। वेटिकन चर्च के पोप के बयान के बाद एक तरफ तो तुर्की आग बबूला है तो दूसरी तरह यूरोप की मुस्लिम आबादी को घृणा, अपमान, तिरस्कार जैसे व्यवहार से गुजरना पड़ रहा है। यूरोप की मुस्लिम समुदाय पूर्व के मुस्लिम बर्बरता के इतिहास और वर्तमान में मुस्लिम आतंकवाद की मानसिकता को लेकर पहले से निशाने पर हैं। आर्मीनियाई नरसंहार के इतिहास को आधार बना कर मुस्लिम आबादी को घृणास्पद हथकंडों का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए। इतिहास से सबक लेने की जरूरत होती है, इतिहास की बूरी चीजों का अनुकरण करना या फिर बदले की भावना से ग्रसित होकर अपराध करने की स्वीकार्यता नहीं होनी चाहिए।
आधुनिक तुर्की के निर्माण में आर्मीनियाइ्र्र समुदाय की बड़ी भूमिका थी। आर्मीनियाई समुदाय ईसाई थे। उनकी उदारता सर्वश्रेष्ठ थी। मजहबी रूढ़ियों के वे सहचर नहीं थे। विज्ञान और कला में उनकी सर्वश्रेष्ठता थी। तुर्की में रेल का विकास, सड़क का विकास बाजार का विकास में आर्मीनियाई लोगों की बड़ी भूमिका थी। उन्नीसर्वी सदी में तुर्की के एस्कीशेहिर और वाॅन, दो ऐसे शहर थे जिसे हम संघाई का दर्जा दे सकते हैं। जिस तरह चीन का संघाई पूरी दुनिया में अपने औद्योगिक उत्पादन के लिए आज मशहूर है जिसके आधार पर चीन की अर्थव्यवस्था टिकी हुई है उसी तरह से उस समय आधुनिक तुर्की का एस्कीशेहिर और वाॅन प्रमुख औद्योगिक शहर थे। एस्कीशेहिर और वाॅन शहर से पूरा यूरोप कलात्मक वस्तुए खरीदता था। यूरोप की व्यापारिक जरूरतों को पूरा करने के कारण एस्कीशेहिर और वाॅन शहर ज्ञान-विज्ञान का भी केन्द्र था। उस काल में एस्किीशेहिर और वाॅन सहित जितने भी शहर थे सभी पर अर्मीनियाई समुदाय का आधिपत्य था। आर्मीनियाई समुदाय की विशेषता यह भी थी कि वे मजहबी रूढ़ियों को आधार बना कर मजहब के प्रचार-प्रसार के विरोधी थे।
 यूरोप और अरब के बीच में होने के कारण तुर्की पर दो संस्कृतियों की छाप थी। एक अरब की रूढ़ियों से ग्रसित संस्कृति और दूसरी यूरापे की खुलापन की संस्कृति, जिसे हम उपयोग-उपभोग की संस्कृति भी कह सकते हैं। पर प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व ही तुर्की को अरब की रूढियों वाली संस्कृति ने कब्जे में ले लिया था, जिसमें कट्टरता भी थी, हिंसा भी थी और एकात्मक सर्वश्रेष्ठता की मानसिकता थी। जब किसी भी संस्कृति के अंदर में कट्टरता, हिंसा और एकात्मकता की सर्वश्रेष्ठता की मानसिकता रचती-बसती है और खतरनाक तौर पर प्रसार पाती है तो उसके परिणामों की कल्पना की जा सकती है। तुर्की में भी कुछ ऐसा ही हुआ। अरब की रूढ़ियों वाली कट्टरता, हिंसा, और एकात्मक सर्वश्रेष्ठता के खूनी पंजे जैसे ही तुर्की को चपेट मे लिये वैसे ही तुर्की यूरोप की उदारता व खूलेपन की संस्कृति का प्रभाव समाप्त हो गया। मुस्लिम सर्वश्रेष्ठता की आंच धधकने लगी। आर्मीनियाई समुदाय के सामने सिर्फ मुस्लिम होने या फिर तुर्की छोड़ कर भागने का विकल्प था। मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ आटोमन सम्राज्य भी खड़ा था। परिणाम यह हुआ कि जो आर्मीनियाई समुदाय के लोग सक्षम थे वे यूरोप या फिर पडोसी ईरान-इराक में पलायन कर गये पर जो पलायन नहीं कर सके, उसके हिस्से में मुस्लिम कट्टरपंथियो और आॅटोमन सम्राज्य के हाथों मौत आयी।
आर्मीनियाई नरसंहार के सौ साल हो गये पर मुस्लिम देशों में गैर मुस्लिम समुदाय के प्रति सोच में कोई परिवर्तन नहीं आया है। मिश्र में कई लाखों ईसाइयों को देश छोड़ने के लिए बाध्य किया गया, सूडान, नाइजीरिया, सोमालिया सहित दर्जनों अफ्रीकी देशों में मुस्लिम आतंकवादी संगठन ईसाइयों पर नरसंहार के दौर चला रखे हैं। बोको हरम जैसे आतंकवादी संगठन ने हजारों ईसाई लडकियों को कैसे बंधक और उपभोग की वस्तू बनाया है, यह भी जगजाहिर है। आईएस जैसे मुस्लिम आतंकवादी संगठन यजीदी महिलाओं के साथ किस प्रकार के व्यवहार कर रहे हैं, यह सब दुनिया के लिए चिंता का विषय है। मुस्लिम बहुल देशों में गैर मुस्लिम समुदाय डर-भय और हिंसा में जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर होते हैं।
आर्मीनियाई समुदाय का आक्रोश है कि जिस प्रकार से दुनिया ने यहूदी नरसंहार के खिलाफ आवाज उठायी है उस प्रकार से आर्मीनियाई नरसंहार की आवाज नहीं उठायी गयी है। यह सही बात है कि दुनिया यहूदी नरसंहार की बात तो स्पष्ट तौर पर जानती है पर आर्मीनियाई नरसंहार की बात कम ही जानती है। अगर वेटिकन के पोप ने आर्मीनियाई नरसंहार की बात को न उठाते तो दुनिया का आम-आदमी को शयद ही पता होता कि आर्मीनियाई नरसंहार के सौ साल हो गये। जहां तक यहूदी नरसंहार की बात है तो पूरी दुनिया ने यहूदियों के जख्मों पर मल्हम लगाया है, यहूदियों को इजरायल के रूप में एक अलग देश मिला है। यहूदी आज पूरी दुनिया में अपनी उपलब्धि व हुनर का लौहा मनवा रहे हैं। पर यहूदियों की तुलना आमीनियाई समुदाय पर दुनिया ने नहीं के बराबर ध्यान दिया हैं। आर्मीनियाई समुदाय की तुर्की में जो संस्कृति थी, आर्मीनियाई समुदाय के जो अवशेष थे उसको भी जमींदोज कर दिया गया। जबकि जरूरत आर्मीनियाई समुदाय के अवशेष को संरक्षित रखने की थी। इसलिए कि आनेवाली पीढ़ियों को दिखाया-समझाया जा सके कि मजहबी घृणा कितनी खतरनाक होती है, कितनी अमानवीय होती है। मानवता के लिए सभी प्रकार की मजहबी घृणएं अमान्य होनी चाहिए।
तुर्की आज खुद मोहम्मद कमाल पाशा के सिद्धांतों की कब्र पर बैठा हुआ है। तुर्की आज पूरी तरह से मजहबी रूढ़ियों और विसंगतियों के कैद में खड़ा है। शासन के कई कानूनों पर मजहबी रंग चढ़ाया गया है। यही कारण है कि यूरोपीय यूनियन ने तुर्की को सदस्यता प्रदान करने से इनकार कर दिया था। तुर्की इस बात का जवाब नहीं देता है कि आर्मीनियाई समुदाय के कला, विज्ञान और व्यापार के अवशेषों का संग्रहित-संरक्षित कर क्यों नहीं रखा गया।
बदले की भावना खतरनाक होती है। हैवान को जवाब देने के हैवानित पर नहीं उतरना चाहिए। इसंान को इंसानियत कायम रखने में ही भलाई है। आर्मीनियाई नरसंहार या फिर मुस्लिम आतंकवाद को आधार बना कर यूरोप की मुस्लिम आबादी को घृणा व तिस्कार का पात्र नहीं बनाया जाना चाहिए। आर्मीनियाई नरसंहार की कसौटी पर ईसाई-मुस्लिम सर्वश्रेष्ठता की आंच भी खतरनाक है। ऐसी आंच से किसी की सर्वश्रेष्ठता हासिल नहीं हो सकती है। दुनिया को यही कोशिश करनी चाहिए कि यहूदी और आर्मीनियाई समुदाय की तरह भविष्य में और किसी अन्य समुदाय का नरसंहार व कत्लेआम की लोमहर्षक-अमानवीय घटनाएं नहीं घट सके। पर आर्मेनियाई नरसंहार की कसौटी पर मुस्लिम देशों में गैर मुस्लिम समुदाय का मानवाधिकार की रक्षा करने का प्रश्न शेष है।

No comments:

Post a Comment