भाई योगेन्द्र यादव जी,
पिछले कुछ वर्षों में देश के इतिहास ने कुछ ऐसी लहरों को
उठते देखा है जो इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं कि देश की जनता एक सार्थक राजनीतिक विकल्प के
लिए व्याकुल है. जब भी कोई आशा की किरण दिखती है तो देश की जनता उस ओर मुड़कर उसे
विजयमाल पहनाती है और सिंहासनस्थ करती है,
इस उम्मीद में अब शायद यह किरण व्यवस्था परिवर्तन का सूर्य बनकर उदित होगी. लेकिन
दुर्भाग्य से हर बार उसके हाथ निराशा ही लगती है. हम और आप ने कम-कम तीन बार ऎसी
परिस्थितियों को खुद देखा है, पहले जे.पी. आन्दोलन, फिर अन्ना और ‘आप’ का आन्दोलन,
और फिर मोदी का आरोहण.
१९७७ में हमने अपने जीवन काल में पहली बार एक लहर देखी
जब सम्पूर्ण क्रांति के आगाज के साथ एक आन्दोलन का उदय हुआ. जनता ने यह जल्दी ही
पाया कि यह नारा खोखला था, और इसके पीछे परिवर्तन की सुविचारित रूप-रेखा नहीं थी.
इस क्रांति के आगाज के पीछे एक क्रांतिकारी व्यक्ति था और कुछ अलग-अलग विचारों और
भावनाओं से प्रेरित कुछ समूह और संगठन थे. इस क्रांति को जनता ने जल्दी ही असफल
होते देखा. जेपी ने खुद ही लिखा था कि किसी भी क्रांति के सफल होने के पीछे एक क्रान्तिकारी
नेतृत्व के अलावा एक क्रान्तिकारी संगठन की भी जरूरत होती है. एक बात जेपी फिर भी भूल गए कि एक क्रांति को
दिशा देने और स्थायित्व प्रदान करने के लिए एक
सुस्पष्ट और सुविचारित व्यस्था-परिवर्तन के मानचित्र की भी जरुरत होती है.
जब अन्ना-केजरीवाल आन्दोलन का उद्भव हुआ तो जनता एक बार फिर आशान्वित हुयी, लेकिन
जो इतिहास की दृष्टि रखते हैं वे तब भी देख सकते थे कि इस आन्दोलन का भविष्य किस
प्रकार होगा. मैंने भी एक दर्शक के तौर पर उस वक्त २०१२ में, जब अन्ना जंतर-मंतर
पर भूख हड़ताल पर बैठे हुए थे, तब द टाइम्स ऑफ़ इंडिया को एक लेख भेजा था, जिसे उसने
१ अगस्त, २०१२ को अपने सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया था, और उसे शीर्षक दिया
था ‘रिवोल्यूशन विदाउट आइडियाज़’. यह
शीर्षक टाइम्स ऑफ़ इंडिया वालों ने ही दिया
था. मैंने नहीं. मैंने जो शीर्षक दिया था, वह था ‘द हंगर ऑफ़ हजारे.’ बहरहाल, शीर्षक चाहे जो भी दिया गया हो, उस लेख में
अन्ना आन्दोलन की संभावनाओं के साथ-साथ उसकी कमजोरियों का भी संकेत दिया गया था. मैं
वह आर्टिकल संलग्न कर रहा हूँ. उसमें कहा
गया है कि एक ऐसा संगठन बनाने की जरुरत है जो नेतृत्व की ‘कोटरी’ से अपने आप को
बहार निकालकर अपने आप को विस्तारित करे, और स्वतंत्रता के पूर्व के राष्ट्रीय
कांग्रेस की तर्ज पर जनतांत्रिक तरीके से अलग-अलग व्यक्तियों को अलग-अलग समय चुनकर
संगठन को नेतृत्व प्रदान करने का अवसर दे, यानी आज की शब्दावली में ‘इन्क्लूसिव’
हो. तभी यह दिख रहा था की अन्ना और
अरविन्द के व्यक्तित्व से ऐसे किसी संगठन का उद्भव शायद संभव नहीं था, और ऐसा ही
हुआ. इस विषय पर मैंने अपनी पुस्तक ‘सम्पूर्ण क्रांति की भूमिका’ में और विस्तार
से लिखा है, जो मैं आपको शीघ्र भेजूंगा. यह पुस्तक २०१२ में मैंने पूरी कर ली थी मगर अभी भी कुछ कारणों से इसका प्रकाशन
लंबित है. चूँकि उस वक्त ईमेल से मैंने इस पुस्तक के ड्राफ्ट को समीक्षा के लिए कई
लोंगों के पास भेजा था, इसलिए वह मूल ड्राफ्ट अभी भी यथावत सुरक्षित है. आप जब
चाहे देख सकते हैं.
इतिहास उस समय जो संकेत दे रहा था वह अब सही निकलने लगा
है. अरविन्द की तानाशाही और फासीवादी मनोवृति अपने पूरे रंग-रोगन के साथ प्रकट हो
गयी है, जिसके शिकार आज आप जैसे लोग हैं, जिन्होंने उस समय किन्हीं कारणों से इस बात को अनदेखा किया या चुप रहे, और
अब इसका शिकार देश और समाज भी हो सकता है.
लेकिन सिर्फ आलोचना करने से क्या होगा? आवेश में या हड़बड़ी में गलतियाँ दोहराने से कोई
लाभ नहीं होगा. मैं इस पत्र में इससे अधिक
नहीं लिखना चाहूँगा. मगर आपकी रूचि बनी तो
चर्चा और आगे बढ़ेगी. मैं आपको एक शालीन, अनुशासित, प्रबुद्ध और ‘मच्योर’ व्यक्ति के रूप में समझता रहा हूँ. इस बीच प्रयत्न
करता हूँ कि मेरी पुस्तक ‘सम्पूर्ण क्रांति की भूमिका’ की एक प्रति आपको शीध्र ही
पहुंच जाये ताकि आप उसमें व्यक्त विचारों
के आधार पर एक विशद चर्चा के लिए तैयार हो सकें, और हमारे बीच विचार-विनिमय हो
सके. मगर मैं दो-तीन बातें पत्र शेष करने के पहले आपसे कहना चाहूंगा.
· एक प्रबुद्ध, आत्मानुशासित, और आधारभूत वैचारिक एकता और भावात्मक एकता से
संपन्न संगठन, जिसमें विचारिक विविधता के लिए भी स्थान हो, धीरज के साथ बनाने की जरूरत है. हम उसकी कोशिश
कर रहे हैं. इस संगठन के लिए व्यक्तियों
की तलाश गंभीरता के साथ जरूरी है.
·
व्यवस्था परिवर्तन की बातें करने से ही नहीं होगा; व्यवस्था परिवर्तन की एक
मोटी-मोटी रूप रेखा विकसित कर सबके सामने
रखने होगी जिसपर मतैक्य बन सके. ‘सम्पूर्ण क्रान्ति की भूमिका’ इसी दिशा में एक
प्रयास है. यह कार्य करने के बाद ही हमने राजनीति में पाँव रखा है.
· पार्टी को संविधान के अनुकूल चलाने की गंभीर व्यवस्था संविधान में ही होनी
चाहिए. हमारी पार्टी ने इसीलिए हर स्तर पर ‘संविधानपाल’ का प्रावधान रखा है.
·
खंड खंड में काम करने से यह देश नहीं बनेगा; एक युक्ति सांगत प्रक्रिया के
अंतर्गत ऐसे लोगों को साथ आना होगा जो राजनीतिक ‘स्पेक्ट्रम’ के ध्रुवान्तों पर
नहीं खड़े हों. मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि देश हममे से प्रत्येक से बड़ा है, और
देश का स्वार्थ हममे से प्रत्येक के स्वार्थ से ऊपर.
आप समझ पायेंगे कि ऐसा होने के बाद अगर हम जनआन्दोलन
सृजित करते हैं, जो मुझे बहुत कठिन नहीं दीखता, तो क्रान्ति को स्थायित्व मिल
पायेगा. नहीं तो ऐसी ही राजनितिक हुड़दंग होती रहेगी. एक और बात समझने की है : सिर्फ संघर्ष से दिश
का कल्याण नहीं होगा; साथ साथ सेवा कार्य और रचनात्मक कार्य करने ही होंगे,
ताकि कार्यकर्ताओं और नेतृत्वकर्ताओं का
चरित्र निर्माण और चरित्र परीक्षण दोनों होते रहें.
मैं आपके अवलोकन के लिए दल के संविधान का एक अंश
‘आइडियोलोजी’ भेज रहा हूँ. हम चाहे जहां
भी खड़े हों, ‘डायलाग’ का सेतु हमें जोड़ता रहे यह एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी
है.
साग्रह और सप्रेम,
पी के सिद्धार्थ
२
अप्रैल, २०१५
No comments:
Post a Comment