Monday, 13 April 2015

रामराज्य का विचार - भाग २


दैहिक दैविक भौतिक तापा | राम राज नहिं काहुहि ब्यापा ||
सब नर करहिं परस्पर प्रीती | चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ||

साधारण अर्थ : राम राज्य में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप (कष्ट) किसी को भीई नहीं व्यापते. सब मनुष्य  परस्पर प्रेम करते हैं, और वेदों में बताई हुई नीति के अनुकूल स्वधर्म का पालन करते हैं.


विशेष टिपण्णी : उस समय वेद ही प्रधान थे; गीता का प्रणयन नहीं हुआ था. वेद विशद हैं – बहुत बड़े हैं, और अनेक हैं. उनमें से काम की चीज़ें निकालना कठिन है; अब महज ७०० श्लोकों की गीता ही अधिक उपयुक्त है जो वेदों और उपनिषदों का निचोड़ है. आज के सन्दर्भ में कहें तो हिन्दू, शिया, सुन्नी और अहमदिया मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी, बहाई, बौद्ध-जैन आपस में प्रेम से मिल जुल कर रहें, और अपने-अपने धर्म की अच्छी बातों का पालन करें, यह अभिप्राय होगा.

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