आदरणीय अन्ना जी
मैं, पी के सिद्धार्थ, एक भूतपूर्व आईपीएस अधिकारी हूँ
जिसमे वर्ष २०१० में अपनी इच्छा से नौकरी का त्याग कर दिया था ताकि सारा समय
सामाजिक कार्यों में दे सकूँ. नौकरी में रहते हुए भी मैंने १९९८-१९९९ में देश के
कई दर्जन ईमानदार और ख्याति नागरिकों के साथ मिलकर एक संस्था ‘भारत शोध’ का
निर्माण किया था जिसके पब्लिक अफेयर्स फोरम ‘राष्ट्रीय मुद्दों का नागरिक आयोग’ में
जस्टिस पी.बी. सावंत, जस्टिस कृष्णा अय्यर, जस्टिस जसवंत सिंह, नृत्यांगना यामिनी
कृष्णमूर्ति, आई.आई.एम, अहमदाबाद के पूर्व निदेशक प्रदीप खांडवाला, श्याम वेनेगल
(फ़िल्म निदेशक), संगीत साम्राज्ञी किशोरी अमोनकर, मौलाना वहीदुद्दीन खान,
अर्थशास्त्री डॉ. ए.एम. खुसरो, इस्लाम के विद्वान डॉ असग़र अली इंजिनियर, पी.टी
उषा, वैज्ञानिक गोविन्द स्वरुप और यु. आर. राव, संविधानविद पी.एन.लेखी जैसे
दर्जनों मान्य नागरिक संस्थापक सदस्यों के रूप में शरीक थे.
आपके सामाजिक कार्य में मैं पुराने समय से रूचि लेता आ
रहा हूँ. वर्ष १९९८ में आपके गाँव रालेगन सिद्धि आपके विकास कार्यों को देखने गया
था. इधर कुछ वर्षों से आपने महाराष्ट्र से बाहर निकलकर राष्ट्रीय मंच पर जब अपनी भूमिका
अदा करनी शुरु की तब से विशेष रूप से आपकी क्रियाविधि का अध्ययन करता रहा हूँ.
जुलाई-अगस्त, २०१२ में जब आप जंतर मंतर पर उपवास पर बैठे
थे, मैंने आपके आन्दोलन के विषय में देश के अन्य आन्दोलनों का परिप्रेक्ष्य बनाकर
एक समालोचनात्मक लेख लिखा था जो १ अगस्त २०१२ को द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सम्पादकीय
पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था ‘रेवोल्यूशन विदाउट आइडियाज़’. मैंने इस
लेख में बार-बार उपवास के शस्त्र का उपयोग किये जाने की तरफ थोड़े आलोचनात्मक संकेत
भी दिए थे, और आपने अगले ही दिन आपना उपवास तोड़ दिया था, जो उचित था.
मेरा यह मानना है कि आपकी संभावनाओं का प्रयोग देश के
लिए पूरी तरह नहीं हो पाया है. इस समय देश का गांधीवादी आन्दोलन बिखरा पड़ा है.
गांधीवादियों से भी अलग कुछ लोग और समूह है जो निष्ठापूर्वक देश के अलग-अलग कोनों
में अलग-अलग पहल कर रहे हैं. आज उन सभी को, जो वाम और दक्षिण के ध्रुवान्तों पर
नहीं खड़े हैं, एक जुट होकर देश को बनाने की जरुरत है.
आपके भाषणों में मैंने आप को बार-बार यह दोहराते सुना है
कि आपने छः विकटें ली हैं. शायद आपका
संकेत उन मंत्रियों के त्यागपत्रों की तरफ होता है जिन्हें आपने पद छोड़ने को बाध्य
किया. चूँकि आप खेल की भाषा में बातें करते हैं इसलिए मैं भी खेल की ही भाषा में
आपसे कुछ बातें विनम्रतापूर्वक करना चाहूंगा. अन्ना जी, सिर्फ विकेट लेने से टीम की विजयी नहीं होती, रन भी बनाने पड़ते हैं. बौलिंग
के साथ बैटिंग भी करनी पड़ती है. तभी टीम विजयी होती है. संघर्ष और विरोध बौलिंग करने
जैसी गतिविधियाँ हैं, जिसमें सफलता मिलने पर विरोधी पक्ष की विकेट गिर जाती है.
लेकिन सिर्फ संघर्ष काफी नहीं होता. इसीलिए गाँधीजी संघर्षों के बीच रचनात्मक
कार्यक्रम और सेवा के कार्यों से अपना और अपने अनुयायियों का समय पाट दिया करते
थे. यह सामजिक कार्यों की एक ‘होलिस्टिक’
या सम्पूर्ण दृष्टि थी. मगर रन बनाने का
सबसे अच्छा मौक़ा तब मिलता है जब आप ‘क्रीज़’ पर स्ट्राइक ले रहे होते हैं, यानी
सत्ता में होते हैं, आपके हाथों में बल्ला होता है. इसीलिए गाँधीजी
स्वतन्त्रतापूर्व भी कांग्रेस को सत्ता में लाने के लिए प्रयत्नशील रहते थे.
आप राजनीति में आने में विश्वास नहीं रखते, यहाँ तक की
आप राजनीति दलों से संपर्क में भी नहीं रहना चाहते. आपको याद होगा, गाँधी जी, जो
आपके आदर्श हैं, हमेशा राजनीति में रहे, कांग्रेस के सदस्य रहे, यद्यपि वे कांग्रेस
में कभी किसी पद के प्रत्याशी नहीं हुए और न ही चुनाव लड़े. सिर्फ एक बार १९२४ में
उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना स्वीकार किया. जहां तक मुझे याद है, वह वर्ष १९३६ था जब गाँधी जी ने
कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया था. फिर भी वे कांग्रेस का
मार्गदर्शन करते रहे, कांग्रेस से जुड़े रहे, और राजनीति करते रहे. इसलिए आपका कहना
कि राजनीति से कोई लेना देना नहीं होना चाहिए, मेरी समझ में नहीं आता. मेरे ख्याल
में आपको इसपर पुनर्विचार करने की जरूरत है. अभी भी इस देश में बहुत से गांधीवादी
हैं, जिनकी सोच काफी विकसित है, मगर जो संघर्ष की दृष्टि से धारदार नहीं रह गए
हैं. वे खेलते तो रहते हैं, मगर गोल नहीं
करना चाहते, या नहीं कर पाते. मगर इतनी उम्र होने के बाद भी आपमें जुझारूपन और धार
बाकी है, जिसकी मै इज्जत करता हूँ. (क्षमा करेंगे, मगर हम सबों को अडवानी जी जैसे
लोगों से प्रेरणा लेनी चाहिए जो ८७ की उम्र में भी देश का प्रधानमन्त्री पद जैसा
गुरुतर भार संभालने को तैयार रहते हैं. उन्हें देख कर तो लगता कि अगले दस सालों तक वे ऐसी
जिमेवारियाँ संभालने की शारीरिक और मानसिक ताकत रखेंगे. ज्योति बाबू पहले ही ऎसी
ही जीवनी शक्ति से संपन्न पुरुष इसी देश
में हो चुके हैं.)
पिछली बार फरवरी में जब मै दिल्ली में था तो आप यहाँ पी.
वी. राजगोपाल के मार्च के सन्दर्भ में दिल्ली पधारे थे. तब मैं आपसे मिलने
महाराष्ट्र सदन गया था. आप तो उपस्थित नहीं थे मगर आपके सचिव श्री दत्ता आवारी और
कर्नल मैन से हमारी मुलाकात हुयी थी. उन्होंने मेरा स्वागत किया और काफी उत्सुकता
दिखाई मगर साथ ही उन्होंने यह भी कहा की अन्ना जी राजनीतिक दलों से संपर्क नहीं
रखना चाहते. आशय यह था की चूँकि मैं एक राजनीति दल से सम्बन्ध रखता हूँ इसलिए
आन्ना जी के कार्यों में मेरा कोई सन्दर्भ नहीं बनता. गाँधी जी के प्रसंशक होने के
नाते मुझे यह बात हैरान करने वाली लगी. मैं अपनी शुभकामनाएं देकर लौट आया. मेरे
ख्याल में आप किसी राजनीतिक दल के पक्ष में भले न काम करें, उनसे संवाद करने में
आपको परहेज नहीं करना चाहिए. एक लोकतंत्र में विचारों का आदान-प्रदान तो चलते ही
रहना चाहिए.
इस बार आपके एक सहयोगी श्री राजेन्द्र सिंह ने, जो पिछली
बार जंतर मंतर में आपके मंच के मुख्य व्यवस्थापक थे, मुझे रांची में फोन किया और
यह आग्रह किया कि दिनांक २ अप्रैल, २०१५ को अन्नाजी दिल्ली में एक गोष्ठी करने
वाले हैं, जिसमें मैं भी जरुर शिरकत करूँ. मैंने श्री राजेंद्र सिंह से फोन पर यह
कहा कि पिछली बार तो मुझे बताया गया था कि अन्ना जी राजनीतिक दलों से सम्बन्ध नहीं
रखना चाहते; तो क्या उन्होंने मन बदल लिया है? कहीं ऐसा न हो कि मैं रांची से
दिल्ली आऊँ और फिर अन्ना जी कहें कि वे राजनीतिक दलों से सम्बन्ध नहीं रखना चाहते.
इसपर श्री राजेंद्र सिंह ने कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है, आप अवश्य आयें.
मैं १ अप्रैल, २०१५ को दिल्ली आ गया. मुझे दिल्ली यों भी
आना था, लेकिन तिथि निश्चित नहीं थी. २ अप्रैल को प्रात: ११:३० बजे आपके सहयोगी
श्री राजेंद्र सिंह ने मेरे सहयोगी और दल के महासचिव श्री कमलेश कुमार गुप्ता को
बताया कि राजनीतिक लोगों का उस गोष्ठी में आना ठीक नहीं होगा क्योंकि यह दूसरे तरह
की गोष्ठी है. मैं अत्यंत हैरान हुआ. मुझे लगता है कि आपको सार्वजनिक करना चाहिए
कि आपके किस सहयोगी की बात को आपके सन्देश का सही प्रतिनिधि माना जाये, और किस
दूरभाष संख्या और किस ईमेल को आपका अधिकारिक संपर्क माना जाये. मेरे विचार से इस
प्रकार की घटनाओं से आपकी छवि धूमिल होती
है, और दूसरे समाजसेवियों की अवमानना भी होती है. इसलिए मैंने यह उचित समझा की
आपका ध्यान इस और आकृष्ट किया जाय.
मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ कि इन छोटी-मोटी घटनाओं
को मैं तूल नहीं देना चाहता और संवाद जारी रखना चाहता हूँ, क्योंकि देश और इसकी
समस्याएं इन चीज़ों से बहुत बड़ी हैं, और हमसे और आपसे भी बड़ी हैं. आज हम सबों के
बीच पारदर्शी खुले संवाद की बहुत जरूरत है. आपको भी खुला संवाद करने की बहुत जरुरत
है, ताकि आप जो कर रहे हैं वह क्यों कर रहे हैं, यह जनता को स्पष्ट हो. मैं आपसे इस
पत्र के उत्तर की आशा करता हूँ.
साग्रह और सप्रेम,
पी के सिद्धार्थ
३
अप्रैल, २०१५
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