Tuesday, 28 April 2015

रामराज्य में हरितक्रान्ति, श्वेतक्रान्ति और गृहउद्योग - भाग ९

लता बिटप मागें मधु चवहीं | मनभावतो धेनु पय श्रवहीं ||
ससी संपन्न सदा रह धरणी | त्रेता भइ कृतजुग कै करनी ||

साधारण अर्थ : बेलें और वृक्ष माँगने से ही मधु टपका देते हैं. गौएं मनचाहा दूध देती हैं. धरती सदा खेती से भरी रहती है. त्रेता में सतयुग की करनी (स्थिति) हो गयी.


विशेष टिपण्णी : ‘ससी संपन्न सदा रह धरणी’ से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि हरितक्रान्ति हो चुकी है, और खेतों में कई फसलें ली जाती हैं – तभी तो धरती हमेशा फसलों से भरी रहती है! ‘गायें मनचाहा दूध देती हैं’ श्वेत क्रान्ति की और संकेत करता है! ‘लता बिटप मागें मधु चवहीं’ यह संकेत करता है कि मधुमक्खियों का पालन हर दूसरे वृक्ष पर हो रहा है, आर्थात लधु और गृह-उद्योगों का जाल रामराज्य में बिछा हुआ है. कृषि, पशुपालन और लघु उद्योग में ही अभी भी भारत की समृद्धि के सूत्र छिपे हुए हैं. 

Sunday, 26 April 2015

Ram Rajya Part 8

फूलहिं फरहि सदा तरु कानन | रहहिं एक सँग गज पंचानन |
खग मृग सहज बयरु बिसराई | सबन्हि परस्पर प्रीती बढ़ाई ||
साधारण अर्थ : वन में वृक्ष सदा फ्फलाते और फूलते हैं. हाथही और सिंह वैर भूल कर एक साथ रहते हैं. पक्षी और पशु सभी ने स्वाभाविक वैर भुला कर आपस में प्रेम बढ़ा लिया है.
विशेष टिपण्णी : वृक्ष जंगल और उद्यान सुरक्षित हैं तभी तो फूलते-फलते हैं. उन्हें कोई काट कर रामराज में नष्ट नहीं करता, नुकसान नहीं पहुँचाता – ‘फौरेस्ट प्रोटेक्शन’ कारगर है.

कूजहिं खग मृग नाना बृंदा | अभय चरहिं बन चरहिं अनंदा ||
सीतल सुरभि पवन बह मंदा |गुंजत अलि लै चलि मकरंदा ||
साधारण अर्थ : पक्षी कूजते हैं, भांति-भांति के पशुओं के समूह वन में निर्भय विचरते और आनंद करते हैं. शीतल मंद सुगन्धित पवन चलता रहता है. भंवरे पुष्पों का रस ले कर चलते हुए गुंजार कर्राते जाते हैं.

विशेष टिपण्णी : अहिंसा का सिद्धांत सिर्फ मनुष्यों पर लागू नहीं है, दया सिर्फ मनुष्यों तक सीमित नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों पर भी लागू है; तभी तो पशु बिना भय के जंगलों में विचरते हैं! यानी पशुओं को मनुष्यों से कूई भय नहीं है. हर जगह सुगन्धित फूलों के पेड़ लगे हुए हैं तभी तो हवाएं सुगंध ले कर चलती हैं और भंवरे गुंजार करते रहते हैं!

Saturday, 25 April 2015

विकास और क्रान्ति

विकास और क्रांति, समग्र या संपूर्ण क्रांति


आज ‘विकास, क्रान्ति, सम्पूर्ण क्रान्ति, समग्र क्रान्ति और व्यवस्था-परिवर्तन जैसे शब्द हवाओं में हैं। ये गम्भीर अर्थों वाले शब्द हैं, इसलिए जनमानस में इनके विषय में स्पष्टता और समझदारी विकसित होना जरूरी है। इन शब्दों के अर्थ पर सोच-विचार के क्रम में दूसरे भी अन्य सम्बन्धित विचारों पर सार्थक रोशनी पड़ सकती है
पहले हम यह समझने की कोशिश करें कि क्रान्ति (रेवोल्यूशन) क्या है और यह उद्विकास (एवोल्यूशन) और विकास (डेवलपमेंट) से कैसे अलग है

विकास की तरह क्रान्ति भी परिवर्तन है। लेकिन क्रान्ति त्वरित परिवर्तन है, तेजी से लाया गया परिवर्तन है। अगर देश ६० महीनों में वे उपलब्धियाँ हासिल कर लेता है जो ६० वर्षों में हासिल नहीं हो सकीं तो यह विकास कहलाएगा, लेकिन जो ६० वर्षों में नहीं हो सका और उसे ६० हफ्तों या उससे भी कम समय में कर दिखाया गया, तो यह होगी क्रान्ति
इसी तरह का फर्क उद्विकास और क्रान्ति के बीच होता है। इसलिए, क्रान्ति एक त्वरित परिवर्तन है। यह एक ऐसा परिवर्तन भी है जिसका व्यापक प्रभाव पड़ता है। लेकन चाहे क्रान्ति हो या विकास, यह परिवर्तन एक ऐसी दिशा में होना चाहिए जिसे लोग सकारात्मक या अच्छी दिशा मान सकें

जिस तरह से इतिहास की पुस्तकें तैयार की जाती हैं उनसे कुछ ऐसा लगता है कि जब भी इंसानी सभ्यता में एक अच्छी दिशा में कोई त्वरित और व्यापक परिवर्तन हुआ, यह हिंसक तरीकों से हुआ। १७७५-८३ के दौरान का अमेरिकी स्वाधीनता-आन्दोलन एक रक्त-रंजित आन्दोलन था। १७८७ और १७९९ के बीच हुई फ़्रांसीसी क्रान्ति भी हिंसा और खून-खराबे से लथपथ थी

१९१७ की रुसी क्रान्ति, उसके पहले और बाद के वर्ष, खून के छीटों से रंगे रहे। चीन ने जिस क्रान्तिकारी परिवर्तन द्वारा विश्व के पाँचवे हिस्से की जनसंख्या की नियति बदल डाली, उसमें भी खून की होलियाँ खेली गईं। ताज्जुब नहीं कि क्रान्ति शब्द अपने साथ हिंसा की बू लेकर चलता है। मगर अब हम एक नजर कुछ दूसरी महान क्रान्तियों पर डालें
 सन् १९०० में दुनिया में इंसान की औसत उम्र हजारों सालों से तीस साल या कम हुआ करती थी। लेकिन १९२६ में पेन्सीलीन की खोज के बाद, और चिकित्सा विज्ञान और स्वास्थ्य सेवाओं में प्रगति तथा अन्न की उपलब्धता की बढ़ोतरी के कारण इंसानों की उम्र कुछ ही दशकों में तेजी से बढ़ने लगी और १९८५ में यह ६२ साल हो गई थी। आज जन्म लेने वाले भारतीयों की औसत उम्र-आशा ६७ साल तथा यूरोप, अमेरिका और जापान में ८० साल के करीब हो गई। जो हजारों सालों में नहीं हो सका, वह कुछ दशकों में हो गया एक त्वरित, सकारात्मक और व्यापक परिवर्तन। यह एक महान क्रान्ति थी। एक गुपचुप क्रान्ति, जो हिंसा की कोख से नहीं उपजी बल्कि मानवीय मस्तिष्क की शक्तियों के प्रयोग और संगठित इंसानी प्रयासों के माध्यम से घटित हुई। इसी प्रकार औद्योगिक क्रान्ति हिंसा से नहीं हुई
उसके पीछे मनुष्य की सोच, अनुसन्धान, कड़ी मेहनत और उद्यमिता जैसे कारण थे। औद्योगिक क्रान्ति ने एकाएक योरोप का, और उसके साथ दुनिया का, नक्शा बदल दिया

हम देखेंगे कि कई क्षेत्रों में भारत में त्वरित क्रान्तियाँ हो सकती हैं। मगर हम ठहराव या धीमे विकास की गति से चल रहे हैं, और यह सब खामख्वाह, क्योंकि महज कुछ कानून और नीतियाँ बदलने से, व्यवस्था और प्रणालियाँ बदलने से, अलग-अलग क्षेत्रों में तत्काल क्रान्तियाँ आ सकती हैं। हौंग-कौंग के इंडिपेंडेंट कमिशन अगेंस्ट करप्शन जैसी स्वायत्त और धारदार संस्था राज्यों में बन जाए, केन्द्र में बन जाए, तो भ्रष्टाचार पर शीघ्र ही अंकुश लग जाए जैसा कि हौंग-कौंग में हुआ। एक अत्यन्त भ्रष्ट समाज इंडिपेंडेंट कमिशन अगेंस्ट करप्शन के गठित होते ही बहुत जल्दी भ्रष्टाचार मुक्त होने लगा। वहाँ एक क्रान्ति हो गई

कई लोग अभी भी यह कहने को उद्यत हो सकते हैं कि यह सब तो ठीक है, मगर राजनीतिक क्षेत्र में बिना हिंसा के कोई बड़ी क्रान्ति नहीं हो सकती, क्योंकि शासक और शोषक वर्ग शान्ति और सुलह से अपना चरित्र नहीं बदलता, स्थान नहीं छोड़ता। ऐसे लोगों को अभी कुछ दशकों पूर्व के महात्मा गाँधी के नेतृत्व में किए गए उस विराट अहिंसक संघर्ष को याद करना चाहिए जो हिन्दुस्तान की जनता ने अंगरेजों के विरुद्ध छेड़ा।  राजनीतिक परिवर्तनों के लिए निश्चय ही संघर्ष की जरूरत पड़ती है, और पड़ेगी, कभी-कभी तो तीव्र और लम्बे संघर्ष की, लेकिन जरूरी नहीं कि ये संघर्ष हिंसक हों
आज जब भारत स्वतन्त्र है और जब हमारा अपना जनतन्त्र है, जब हम खुद ही अपना कानून बनाते हैं, खुद ही नीतियाँ बनाते हैं, तो ऐसे में क्रान्तिकारी व्यवस्था-परिवर्तन बिना हिंसा के क्यों नहीं हो सकते ? इसके लिए संघर्ष की जरूरत पड़ेगी, आन्दोलनों की जरूरत पड़ेगी, मगर उनके साथ पहले वैचारिक स्पष्टता की जरूरत पड़ेगी, चिन्तन और मनन की जरूरत पड़ेगी। ऐसे ही चिन्तन-मनन और जनसंघर्ष के कारण सूचना का अधिकार-जैसा क्रान्तिकारी कानून आ पाया और एक विशेष क्षेत्र में व्यवस्था-परिवर्तन हुआ। अर्थात क्रान्तिकारी व्यवस्था-परिवर्तन के लिए कारगर अहिंसक अस्त्र-शस्त्र देश में उपलब्ध हैं। सिर्फ उनका प्रयोग हमें सूझ-बूझ के साथ और दृढ़ निश्चय के साथ करना है

ये तो हुई बातें क्रान्ति की, हिंसक और अहिंसक क्रान्तियों की। अब हम आएँ समग्र या सम्पूर्ण क्रान्ति पर। समग्र क्रान्ति एक ऐसा त्वरित परिवर्तन है जो वैयक्तिक और सामाजिक जीवन के किसी एक क्षेत्र में नहीं बल्कि कई प्रमुख क्षेत्रों में एक साथ घटित होता है, जिनमें राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक संरचना, सामाजिक चेतना और इसी प्रकार अन्य सभी प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं। समग्र क्रान्ति बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों, स्त्रियों और पुरुषों, बच्चों और बुजुर्गों, उत्तर और दक्षिण, पूरब और पश्चिम सभी को क्रान्ति-चक्र में खींचती है
किसी भी परिवर्तन का हमारे ऊपर रचनात्मक प्रभाव पड़े इसके लिए जरूरी है कि उस परिवर्तन को इस प्रकार लाया जाए कि वह हमारे जीवन को असह्य न बना दे। बिना समुचित परिवर्तन-प्रबन्धन के कोई भी त्वरित परिवर्तन खतरनाक हो सकता है

एक सभ्यता को उसकी जड़ों से उखाड़ कर, उसके इतिहास से उखाड़कर, उसे पुष्पित-पल्लवित नहीं किया जा सकता। परिवर्तन की गति चाहे जितनी भी तेज हो, हमारी सभ्यता का वृक्ष चाहे जितनी भी तेजी से आसमान की ओर बढ़े, उसे अपनी जड़ों के ऊपर ही बढ़ना होगा


आर्मीनिया नर संहार के १०० वर्ष

राष्ट्र चिंतन
                 आर्मीनिया नरसंहार के सौ साल
    आर्मीनिया की आंच में मुस्लिम-      ईसाई सर्वश्रेष्ठता


हैवान को जवाब देने के हैवानित पर नहीं उतरना चाहिए। इसंान को इंसानियत कायम रखने में ही भलाई है। आर्मीनियाई नरसंहार या फिर मुस्लिम आतंकवाद को आधार बना कर यूरोप की मुस्लिम आबादी को घृणा व तिस्कार का पात्र नहीं बनाया जाना चाहिए। आर्मीनियाई नरसंहार की कसौटी पर ईसाई-मुस्लिम सर्वश्रेष्ठता की आंच भी खतरनाक है। ऐसी आंच से किसी की सर्वश्रेष्ठता हासिल नहीं हो सकती है। दुनिया को यही कोशिश करनी चाहिए कि यहूदी और आर्मीनियाई समुदाय की तरह भविष्य में और किसी अन्य समुदाय का नरसंहार व कत्लेआम की लोमहर्षक-अमानवीय घटनाएं नहीं घट सके। पर आर्मेनियाई नरसंहार की कसौटी पर मुस्लिम देशों में गैर मुस्लिम समुदाय का मानवाधिकार की रक्षा करने का प्रश्न शेष है।


         विष्णुगुप्त


अति वीभत्स, लोमहर्षक व अमानवीय आर्मीनिया नरसंहार की घटना के सौ साल पूरे हो गये। आर्मीनिया नरसंहार में करीब 15 लाख लोगों की हत्या हुई थी। 24 अप्रैल 1915 को तुर्की के आटोमन साम्राज्य ने राजधानी कास्टैटिनोपोल से दो सौ आर्मीनियाई समुदाय के लोगों को गिरफ्तार किया था और फिर आर्मीनियाई समुदाय के खिलाफ पूरे आटोमन सम्राज्य में सामूहिक हिंसा हुई थी, कत्लेआम के घटना हुई थी। संपन्न आर्मीनियाई किसी न किसी प्रकार अपनी जान बचाने के लिए निकटवर्ती ईरान-इराक भाग गये थे पर 15 लाख से अधिक अर्मीनियाई लोग अपनी जान गंवाने के लिए मजबूर हुए थे। प्रथम विश्व युद्ध के समय की इस घटना को कोई इतिहासकार मुस्लिम  समुदाय की बर्बर कारवाई व हिटलर जैसा घृणास्पद कत्लेआम मानता है तो कोई इतिहासकार इसे दुनिया पर मुस्लिम-ईसाई सर्वश्रेष्ठता की प्रतिद्वद्विता के चश्मे से देखता है। इतिहासकारों या समाजविज्ञानियों की कोइ्र्र भी धारणा क्यों न हों पर यह सत्य है कि आर्मीनियाई समुदाय पर भयानक,बर्बर हिंसा हुई थी और उनका समूल नष्ट करने की अमानवीय अभियान चलाया गया था और यह अभियान उस समय के आटोमन सम्राज्य की छत्रछाया में चला था। आधुनिक तुर्की पर आर्मीनियाई नरसंहार एक कलंक के तौर पर है। 
             आर्मीनियाई नरसंहार के सौ साल पूरे होने पर पूरे यूरोप मे आर्मीनियाई समुदाय के प्रति हमदर्मी दिखायी जा रही है, आर्मीनियाई नरसंहार से जुड़े तथ्यों व कहानियों को प्रदर्शित किया जा रहा है। वेटिकन पोप ने भी आर्मीनियाई समुदाय का हुआ नरसंहार को पिछली 20 वीं सदी का सबसे बड़ा नरसंहार करार दिया है और मानवता के प्रति घृणास्पद अपराध करार दिया है। वेटिकन चर्च के पोप के बयान के बाद एक तरफ तो तुर्की आग बबूला है तो दूसरी तरह यूरोप की मुस्लिम आबादी को घृणा, अपमान, तिरस्कार जैसे व्यवहार से गुजरना पड़ रहा है। यूरोप की मुस्लिम समुदाय पूर्व के मुस्लिम बर्बरता के इतिहास और वर्तमान में मुस्लिम आतंकवाद की मानसिकता को लेकर पहले से निशाने पर हैं। आर्मीनियाई नरसंहार के इतिहास को आधार बना कर मुस्लिम आबादी को घृणास्पद हथकंडों का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए। इतिहास से सबक लेने की जरूरत होती है, इतिहास की बूरी चीजों का अनुकरण करना या फिर बदले की भावना से ग्रसित होकर अपराध करने की स्वीकार्यता नहीं होनी चाहिए।
आधुनिक तुर्की के निर्माण में आर्मीनियाइ्र्र समुदाय की बड़ी भूमिका थी। आर्मीनियाई समुदाय ईसाई थे। उनकी उदारता सर्वश्रेष्ठ थी। मजहबी रूढ़ियों के वे सहचर नहीं थे। विज्ञान और कला में उनकी सर्वश्रेष्ठता थी। तुर्की में रेल का विकास, सड़क का विकास बाजार का विकास में आर्मीनियाई लोगों की बड़ी भूमिका थी। उन्नीसर्वी सदी में तुर्की के एस्कीशेहिर और वाॅन, दो ऐसे शहर थे जिसे हम संघाई का दर्जा दे सकते हैं। जिस तरह चीन का संघाई पूरी दुनिया में अपने औद्योगिक उत्पादन के लिए आज मशहूर है जिसके आधार पर चीन की अर्थव्यवस्था टिकी हुई है उसी तरह से उस समय आधुनिक तुर्की का एस्कीशेहिर और वाॅन प्रमुख औद्योगिक शहर थे। एस्कीशेहिर और वाॅन शहर से पूरा यूरोप कलात्मक वस्तुए खरीदता था। यूरोप की व्यापारिक जरूरतों को पूरा करने के कारण एस्कीशेहिर और वाॅन शहर ज्ञान-विज्ञान का भी केन्द्र था। उस काल में एस्किीशेहिर और वाॅन सहित जितने भी शहर थे सभी पर अर्मीनियाई समुदाय का आधिपत्य था। आर्मीनियाई समुदाय की विशेषता यह भी थी कि वे मजहबी रूढ़ियों को आधार बना कर मजहब के प्रचार-प्रसार के विरोधी थे।
 यूरोप और अरब के बीच में होने के कारण तुर्की पर दो संस्कृतियों की छाप थी। एक अरब की रूढ़ियों से ग्रसित संस्कृति और दूसरी यूरापे की खुलापन की संस्कृति, जिसे हम उपयोग-उपभोग की संस्कृति भी कह सकते हैं। पर प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व ही तुर्की को अरब की रूढियों वाली संस्कृति ने कब्जे में ले लिया था, जिसमें कट्टरता भी थी, हिंसा भी थी और एकात्मक सर्वश्रेष्ठता की मानसिकता थी। जब किसी भी संस्कृति के अंदर में कट्टरता, हिंसा और एकात्मकता की सर्वश्रेष्ठता की मानसिकता रचती-बसती है और खतरनाक तौर पर प्रसार पाती है तो उसके परिणामों की कल्पना की जा सकती है। तुर्की में भी कुछ ऐसा ही हुआ। अरब की रूढ़ियों वाली कट्टरता, हिंसा, और एकात्मक सर्वश्रेष्ठता के खूनी पंजे जैसे ही तुर्की को चपेट मे लिये वैसे ही तुर्की यूरोप की उदारता व खूलेपन की संस्कृति का प्रभाव समाप्त हो गया। मुस्लिम सर्वश्रेष्ठता की आंच धधकने लगी। आर्मीनियाई समुदाय के सामने सिर्फ मुस्लिम होने या फिर तुर्की छोड़ कर भागने का विकल्प था। मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ आटोमन सम्राज्य भी खड़ा था। परिणाम यह हुआ कि जो आर्मीनियाई समुदाय के लोग सक्षम थे वे यूरोप या फिर पडोसी ईरान-इराक में पलायन कर गये पर जो पलायन नहीं कर सके, उसके हिस्से में मुस्लिम कट्टरपंथियो और आॅटोमन सम्राज्य के हाथों मौत आयी।
आर्मीनियाई नरसंहार के सौ साल हो गये पर मुस्लिम देशों में गैर मुस्लिम समुदाय के प्रति सोच में कोई परिवर्तन नहीं आया है। मिश्र में कई लाखों ईसाइयों को देश छोड़ने के लिए बाध्य किया गया, सूडान, नाइजीरिया, सोमालिया सहित दर्जनों अफ्रीकी देशों में मुस्लिम आतंकवादी संगठन ईसाइयों पर नरसंहार के दौर चला रखे हैं। बोको हरम जैसे आतंकवादी संगठन ने हजारों ईसाई लडकियों को कैसे बंधक और उपभोग की वस्तू बनाया है, यह भी जगजाहिर है। आईएस जैसे मुस्लिम आतंकवादी संगठन यजीदी महिलाओं के साथ किस प्रकार के व्यवहार कर रहे हैं, यह सब दुनिया के लिए चिंता का विषय है। मुस्लिम बहुल देशों में गैर मुस्लिम समुदाय डर-भय और हिंसा में जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर होते हैं।
आर्मीनियाई समुदाय का आक्रोश है कि जिस प्रकार से दुनिया ने यहूदी नरसंहार के खिलाफ आवाज उठायी है उस प्रकार से आर्मीनियाई नरसंहार की आवाज नहीं उठायी गयी है। यह सही बात है कि दुनिया यहूदी नरसंहार की बात तो स्पष्ट तौर पर जानती है पर आर्मीनियाई नरसंहार की बात कम ही जानती है। अगर वेटिकन के पोप ने आर्मीनियाई नरसंहार की बात को न उठाते तो दुनिया का आम-आदमी को शयद ही पता होता कि आर्मीनियाई नरसंहार के सौ साल हो गये। जहां तक यहूदी नरसंहार की बात है तो पूरी दुनिया ने यहूदियों के जख्मों पर मल्हम लगाया है, यहूदियों को इजरायल के रूप में एक अलग देश मिला है। यहूदी आज पूरी दुनिया में अपनी उपलब्धि व हुनर का लौहा मनवा रहे हैं। पर यहूदियों की तुलना आमीनियाई समुदाय पर दुनिया ने नहीं के बराबर ध्यान दिया हैं। आर्मीनियाई समुदाय की तुर्की में जो संस्कृति थी, आर्मीनियाई समुदाय के जो अवशेष थे उसको भी जमींदोज कर दिया गया। जबकि जरूरत आर्मीनियाई समुदाय के अवशेष को संरक्षित रखने की थी। इसलिए कि आनेवाली पीढ़ियों को दिखाया-समझाया जा सके कि मजहबी घृणा कितनी खतरनाक होती है, कितनी अमानवीय होती है। मानवता के लिए सभी प्रकार की मजहबी घृणएं अमान्य होनी चाहिए।
तुर्की आज खुद मोहम्मद कमाल पाशा के सिद्धांतों की कब्र पर बैठा हुआ है। तुर्की आज पूरी तरह से मजहबी रूढ़ियों और विसंगतियों के कैद में खड़ा है। शासन के कई कानूनों पर मजहबी रंग चढ़ाया गया है। यही कारण है कि यूरोपीय यूनियन ने तुर्की को सदस्यता प्रदान करने से इनकार कर दिया था। तुर्की इस बात का जवाब नहीं देता है कि आर्मीनियाई समुदाय के कला, विज्ञान और व्यापार के अवशेषों का संग्रहित-संरक्षित कर क्यों नहीं रखा गया।
बदले की भावना खतरनाक होती है। हैवान को जवाब देने के हैवानित पर नहीं उतरना चाहिए। इसंान को इंसानियत कायम रखने में ही भलाई है। आर्मीनियाई नरसंहार या फिर मुस्लिम आतंकवाद को आधार बना कर यूरोप की मुस्लिम आबादी को घृणा व तिस्कार का पात्र नहीं बनाया जाना चाहिए। आर्मीनियाई नरसंहार की कसौटी पर ईसाई-मुस्लिम सर्वश्रेष्ठता की आंच भी खतरनाक है। ऐसी आंच से किसी की सर्वश्रेष्ठता हासिल नहीं हो सकती है। दुनिया को यही कोशिश करनी चाहिए कि यहूदी और आर्मीनियाई समुदाय की तरह भविष्य में और किसी अन्य समुदाय का नरसंहार व कत्लेआम की लोमहर्षक-अमानवीय घटनाएं नहीं घट सके। पर आर्मेनियाई नरसंहार की कसौटी पर मुस्लिम देशों में गैर मुस्लिम समुदाय का मानवाधिकार की रक्षा करने का प्रश्न शेष है।

Friday, 24 April 2015

देश के आम इंसान के नाम एक चिठ्ठी

आम आदमी के नाम एक चिठ्ठी

प्रिय भाइयो और  बहनो,

आप और हम हर दिन अपनी आँखों से और अखबार तथा टेलिविज़न के माध्यम से अपने राज्य और देश के बुरे हालात का नज़ारा देख रहे हैं. लेकिन क्या आप हम और क्या सिर्फ एक मौन दर्शक बने रहेंगे?
नहीं!  हमें उठ कर खड़ा होना है और दुनिया की महानतम प्राचीन सभ्यताओं में से एक भारत को फिर से खड़ा कर दुनिया का सिरमौर बनाना है. देश में सुराज या सुन्दर राज लाना है, सुशासन लाना है. तभी यह संभव हो पायेगा.

हम मिल जुल कर यह कर सकते हैं.

आप देश में सुराज लाने के इस उद्यम से जुडें. अपने अन्दर के नेतृत्वकर्ता को पहचानें और उसे जगाएँ. भारतीय सुराज दल के तीन घंटों के नेतृत्व-विकास कार्यक्रमों में शरीक  हों और अपने अन्दर के नेतृत्वकर्ता को आत्मविश्वास प्रदान करें, तथा अपने गाँव से ले कर राज्य और देश तक को सुराज की दिशा प्रदान करने के लिए अपने को तैयार करें.  यह कार्यक्रम आपके आत्मविशवास का स्तर हमेशा के लिए बदल देगा, और आपके जीवन में असीमित संभावनाओं के द्वार खोल देगा. दल के दूसरे सेवात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक कार्यक्रमों में भी जरूर हिस्सा लें.  



Thursday, 23 April 2015

देश के बुद्धिजीवियों और क्रियावादियों के नाम एक चिठ्ठी


देश के बुद्धिजीवियों और क्रियावादियों (ऐक्टिविस्ट्स) के नाम एक पत्र

दोस्तो,     
                      
आपमें से प्रत्येक एक विचारक और शायद एक प्रबुद्ध क्रियावादी ऐक्टिविस्ट  भी है, और आप अपने स्तर पर प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझते हुए या तो  संघर्षात्मक या रचनात्मक कार्यों में लगे रहे हैं ताकि समाज बेहतरी की ओर मुड़ सके. लेकिन साथ-ही-साथ आपमें से प्रत्येक यह देख रहा होगा कि देश की परिस्थिति फिर भी बिगड़ती ही जा रही है. इसलिए आपमें से प्रत्येक कहीं-न-कहीं एक हताशा और पराजय का अनुभव कर रहे हैं. जो भ्रष्ट हैं, नैतिकताविहीन हैं, अनगढ़, अनपढ़ और अप्रबुद्ध हैं, वे आपस में सांठ-गांठ कर संसद से सड़क तक अपनी विजय पताका फहरा रहे हैं. अच्छे और ईमानदार समझे जाने वाले व्यक्ति और संगठन हाशिये पर खड़े इतिहास की उस लहर का इंतज़ार कर रहे हैं जो शायद कहीं से उठे और उन्हें बटोर कर वहाँ पहुँचा दे जहां उनका सही गंतव्य है.

२. इतिहास ने समय-समय पर ऐसी लहरों को उठते देखा है.  ऐतिहासिक परिस्थितियों की भूमिका इसमें जरूर होती है, मगर इतिहास इन लहरों को अकेले नहीं गढ़ता. इसमें व्यक्तियों की भूमिका होती है. इतिहास ने आज परिस्थितियाँ बना दी हैं मगर इन  लहरों को खड़ा करने के लिए सही व्यक्ति सही सख्या में नहीं खड़े हो पाए. आज इस देश के ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को खड़ा करने की जरूरत है जो सकारात्मक सोच वाले हों, जिसकी आँखों में राष्ट्रनिर्माण के सपने हों, और जिसका ह्रदय देश  के लिए व्यथित हो. उन सभी व्यक्तियों की शिनाख्त  कर उन्हें  जोड़ लेना है ताकि उनमें से प्रत्येक इतिहास के आने वाले सैलाब की एक प्रखर लहर बन सके और असंख्य ऊर्जस्वित लहरों का यह सैलाब उमड़ कर आज की अनाचारी  व्यवस्था को धराशायी कर दे, और फिर उस सपाट हो गए धरातल पर एक नयी व्यवस्था का निर्माण  कर सके सुराज ला सके.

३. १९४७ में भारत में स्वराज तो आ गया मगर सुराज अभी भी बहुत दूर है. भारतीय सुराज मंच भारत में सुराज या गुड गवर्नेंस लाने का प्रयास करने वाला संगठन है. सुराज लाने के लिए कुछ मूलभूत बातें आवश्यक हैं, जो निम्नलिखित हैं -  

क) व्यवस्था परिवर्तन का स्पष्ट ब्लूप्रिंट - सबसे पहले तो यह निर्णय करना पड़ेगा की राष्ट्रीय जीवन के प्रधान क्षेत्रों - जैसे शिक्षा, कृषि, उद्योग, राजनीतिक व्यवस्था, चुनावी व्यवस्था, प्रशासनिक व्यवस्था आदि - में क्या सुधार किये जाएँ. अर्थात, व्यवस्था-परिवर्तन की एक स्पष्ट रूपरेखा या ब्लूप्रिंट देश के सामने रखना आवश्यक होगा जिसपर व्यापक जनतांत्रिक बहस हो सके और उन विचारों को स्वीकार या अस्वीकार किया जा सके. अनेक मुख्य क्षेत्रों में सुधार के ब्लूप्रिंट तैयार करने का काम एक अच्छे स्तर तक पूरा कर लिया गया है, जिसके एक अंश को लगभग छह सौ पन्नों की एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित भी किया जाना  है. यह ब्लू-प्रिंट आपके सामने भी रखा जाएगा और यदि आपके साथ सहभागिता बनी तो आपसे इस पर विस्तृत चर्चा होगी, और आपके सुझावों से इसे और भी परिवर्धित-संवर्धित किया जायेगा. समग्र क्रान्ति और सम्पूर्ण निर्माण के लिए ये ब्लू-प्रिंट प्रस्थान  बिंदु का काम कर सकते हैं. ये अनंतिम हैं, और इन्हें आगे और विकसित किया जा सकता है.

ख) व्यवस्था-परिवर्तन लाने के लिए व्यक्ति और नेतृत्व तैयार करना - परिवर्तन की कोई भी रूप-रेखा या ब्लूप्रिंट, चाहे वह कितनी भी सुविचारित व सशक्त क्यों न हो, बेकार है, अगर सत्ता में आने पर उस ब्लूप्रिंट को लागू करने वाले लोग कर्तव्यनिष्ठ,  दक्ष और ईमानदार न हों, या सत्ता में न रहने पर जो व्यवस्था-परिवर्तन की रूपरेखा को लागू कराने के लिए ईमानदार संघर्ष न कर सकें और सत्ताधारियों को अपेक्षित परिवर्तन लाने के लिए मजबूर न कर सकें.  इसलिए ऐसे युवाओं और अन्य लोगों की शिनाख्त करना और उन्हें तैयार करना जरूरी होगा जो दोनों ही स्थितियों में कुशल नेतृत्व प्रदान कर सकें. राज्य या देश के सभी भौगोलिक क्षेत्रों में बड़े स्तर पर निर्धारित रचनात्मक और संघर्षात्मक कार्यक्रम लागू करने के लिए बड़ी संख्या में कार्यकर्ता तैयार करने होंगे जो स्थानीय कुशल नेतृत्वकर्ताओं  के द्वारा ही तैयार किये जा सकते हैं. इसी विस्तृत नेतृत्व-श्रृंखला को तैयार करने के लिए एक नेतृत्व-विकास कार्यक्रम तैयार किया गया है जो नेतृत्वशक्ति से सहज रूप से सम्पन्न युवाओं की पहचान करेगा और उनमें निहित नेतृत्व के गुणों को  विकसित करने में मदद करेगा.  इस कार्यक्रम के पहले चरण की एक झलकी आपको यू-ट्यूब पर नेतृत्व के मर्म पर एक हिंदी लघु फिल्म से भी मिल सकती है जिससे आपको यह तुरंत अहसास हो कि इस पूरे उद्यम के पीछे एक छोटी-सी मगर ईमानदार तैयारी है. फिल्म देखने के लिए www.suraajdal.org जा कर  ‘महात्मास्मि - द लीडर इन मी’ नामक वीडियो पर क्लिक करें जो मुख पृष्ठ या होम पेज पर दाहिनी और है.

ग) आइडिओलोजी की रूपरेखा  - संगठन और जमात में फर्क होता है. जमात ज्यादा दिनों तक चल नहीं सकते और जल्द ही टूट कर बिखर जाते हैं. इंडिया अगेंस्ट करप्शन एक जमात था. इसी लिए यह जल्दी ही टूट कर बिखर गया. 'आप' भी एक जमात है. एक संगठन के रूप में व्यक्तियों को जोड़ने के लिए सबसे पहले संगठन के आधारभूत सिद्धांतों या आइडिओलोजी का कथन जरूरी होता है जिसके चारों ओर व्यक्ति इकठ्ठे हो सकें. सुराज मंच ने दो-ढाई पन्नों में अपनी आइडिओलोजी का एक  प्रारूप हिंदी और अंगरेजी दोनों भाषाओँ में  सामने रखा है जो दल की वेबसाईट पर पाया जा सकता है ताकि आप मन बना सकें की क्या आप इससे सहमत हैं. अगर ये सिद्धांत आपके ही विचारों और भावनाओं को प्रतिबिंबित करते हैं  तो आप इन सिद्धांतों पर आधारित एक संगठन के अंग बनने में ख़ुशी महसूस करेंगे. अगर आप इस आइडिओलोजी से पूर्णतः सहमत नहीं तो भी अगर हम वैचारिक रूप से एक  दूसरे के करीब पड़ते हैं तो हम एक दूसरे के कार्यों में सहयोग कर सकते हैं. इसलिए कृपया इस ढाई पृष्ठों की आइडिओलोजी का एक बार गंभीरता से अवलोकन कर  लें, ऐसा आपसे आग्रह है.  

४. उपर्युक्त अजेंडे को अंजाम देने के लिए एकजुट होने के लिए सुराज दल से संपर्क करेंगे तो ख़ुशी होगी.

५. इसमें संदेह नहीं की हम साथ मिल कर देश का परिदृश्य बदल सकते हैं. हमसे आप हमारे फोन नंबरों के अतिरिक्त हमारे ई-मेल पर भी संपर्क कर सकते हैं (suraajdal@gmail.com). यह और भी बेहतर होगा  चूँकि लिखित रूप से हमारे पास विचार करने की सामग्री आ जाएगी, और एक रेकॉर्ड बन जाएगा. ई-मेल न हो तो लिखित रूप से भी पत्राचार हो सकता है.  मगर इसका अर्थ यह नहीं कि हम तत्काल फोन पर बातें नहीं कर सकते या एस.एम.एस. नहीं कर सकते.

पी के सिद्धार्थ 
pradeep.k.siddharth@gmail.com
8252667070 / 9910774066




Wednesday, 22 April 2015

अन्ना का पत्र मोदी के नाम

मान्य अन्ना हजारे ने निम्नलिखित पत्र प्रधान मंत्री को  लिखा है. एक प्रति मेरे पास भी आई है. मैं इसे यथावत नीचे दे दे रहा हूँ. अपनी प्रतिक्रया पीछे दूंगा. 

प्रति,
मा. नरेंद्र मोदी जी,
प्रधानमंत्रीभारत सरकार
साऊथ ब्लॉकराईसीना हिल,
नई दिल्ली - 110011.

देश भर के किसानों के प्रदीर्घ संघर्ष के बादअंग्रेज़ सरकार के सन्‌ 1894 बनाये हुए भूमिअधिग्रहण कानून को बदल करस्वाधीनता के 68 वर्षों बादसन्‌ 2013 में भूमिअधिग्रहणपुनर्वास व पुनर्स्थापन में पारदर्शिता व उचित मुआवजे के अधिकार का नया कानून विगत सरकार को बनाना पडा। उक्त कानून की कुछ मुद्दे किसान हित के पक्ष में थे। नई सरकार ने सत्तासीन होने पर इस कानून में बदलाव हेतु 31 दिसम्बर 2014को अध्यादेश जारी कियाजिसमें किसान हित के कई सारे मुद्दे में बदल हुआ है। इन बदलावों के किसानों पर अन्यायमूलक होने के कारण देश के कई स्वयं सेवी संगठनकिसान संगठन व किसान हित की सोच रखने वाले अनेक विध संस्थान व संगठनों ने विरोध प्रदर्शित किया। देश के कई भागों में आंदोलन शुरु हुए। सरकार को यह आश्वासन देना पडा कि अगर यह कानून किसान विरोधी है तो हमउसमें उचित संशोधन करेंगे। फिर 3 अप्रैल 2015 को सरकार द्वारा नया अध्यादेश जारी हुआ। पर उसमें भी आश्वासन के मुताबिक किसान हित के पक्ष में कोई संशोधन नहीं हुआ। इसलिए विरोधी आन्दोलन भी थमने का नामनहीं ले रहे। यह अध्यादेश किसान हित के पक्ष में है ऐसा बार बार सरकार द्वारा बताया जा रहा है और जनता को भ्रमित किया जा रहा है। अब देश की जनता के सामने हमने यही बात यथा-तथ्य रखने की कोशिश की है कि ये किसान हित में है या किसान विरोधी है।

1)     अध्यादेश द्वारा किये गये बदलाव : 27 सितम्बर 2013 के कानून में प्रयुक्त निजि कम्पनी (Private Company) शब्द प्रयोग स्थान पर निजि संस्थान (Private Entity) शब्दों का प्रयोग किया गया है। इस बदलाव के करने के पीछे सरकार की मंशा क्या है?
सरकार के इरादे : निजि कम्पनी शब्द प्रयोग के कारण कम्पनी एक्ट 1956 के अधीन रहते सरकार अपनी मर्ज़ी के संस्थानों को ज़मीन आबंटित नहीं कर पाती थीऔर चूंकि सम्भवत: सरकार का इरादा वैसा था,इस लिए यह बदलाव लाया गया। एकल संस्थानसाझा (भागीदारी) संस्थानकम्पनीकॉर्पोरेशन्वयंसेवी संगठन या कानूनन संस्थापित किसी भी संस्थान को भूमिआबंटित करना अब सम्भव है जो कि पहले नहीं हो पाता था। हो सकता है किसरकार के करीबी लोगों को लाभ मिले इस हेतु से यह बदलाव लाया गया है। अब कोई निजि संस्थान किसी प्रकल्प: स्कूलकॉलेजहोटल आदि बनाना चाहे तो नये अध्यादेश के तहत्‌ किसानों की ज़मीन अधिग्रहित कर इन संस्थानों के लिए सरकार उपलब्ध करा सकती है। परिणामी गरीब किसानों की हज़ारों एकड ज़मीन का अधिग्रहण किया जा सकता है और उन्हें भूमिहीन बनाया जा सकता है। इसका लाभ समाज के धन सम्पन्न वर्ग के संस्थानों को ही मिलने वाला है। यह किसान हित के विरोधी तो है ही। क्या सरकार का यही इरादा है किअपने करीबी लोगों को इसका लाभ मिलेइसके सिवा अन्य क्या कारण हो सकता हैजो निजि कम्पनी के स्थान पर निजि संस्थान को लाना पडे?

2)                 सन्‌ 2013 भूमिअधिग्रहण मुख्य कानून के विभाग 2 का उपविभाग 2 में अन्य प्रावधान के पश्चात्‌ निम्न प्रावधानों का समावेश किया गया है। खण्ड 10अ में उल्लेखित प्रकल्प तथा उस में दिए उद्दिष्टों के लिए किये गये भूमिअधिग्रहण को इस उपविभाग की शर्त 1 के प्रावधान अनुसार छूट मिलेगी। मुख्य कानून2 का उपविभाग 1 में अन्य प्रावधानों के पश्चात्‌ किए गये प्रावधानों के समावेश के कारण 10अ में उल्लेखित प्रकल्पों को 80 प्रतिशत ज़मीन मालिकों की पूर्व सम्मति की शर्त में से छूट मिल गई है।
 सरकार के किये इन बदलावों के चलते अब निजि संस्थान व उद्योजकों के वास्ते अपनी मर्ज़ी के मुताबिक किसानों की ज़मीन अधिग्रहित करना सरकार के लिए सम्भव हो गया है। इसका सीधा असर यों होगा कि,किसान अपने मूलभूत अधिकारों से हाथ धो बैठेगा। जनतन्त्र विरोधी यह कानून किसानों पर अन्याय मूलक है। सालों साल जो उस ज़मीन के स्वामी रहे हैंउनकी ज़मीन उनकी अनुमति के बगैर छीन कर उद्योजकों या निजि संस्थानों को मुहैया करवाने की कृति सा़फ दर्शाती है किसरकार के क़दमअब बजाय जनतन्त्र के,तानाशाही की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं।
अ)  भारत अथवा देश के किसी हिस्से की रक्षा हेतु या राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु आवश्यक प्रकल्प जिनमें संरक्षण सिद्धता व रक्षा सामग्री उत्पादन प्रकल्प का समावेश हो।
निजि संस्थानों का समावेश रक्षा सामग्री उत्पादन प्रकल्पों में करने पर रक्षा सामग्री के दुरुपयोग होने की सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता। इस कारण देश की अन्तर्गत सुरक्षा के लिए ख़तरा पैदा हो सकता है। इसे देश अथवा देश के किसी हिस्से की सुरक्षा का ख़याल कहना आत्मवंचना ही होगी। केवल मुना़फा खोरी करने वाले निजि संस्थानों को किसानों की ज़मीन उनकी अनुमति के बग़ैर मुहैया करवाने की कृति किसानों के हित में कतई नहीं हैउन पर अन्याय कारी है। रक्षा सामग्री उत्पादन में संलग्न निजि संस्थानों को देश के शत्रु राष्ट्र कई प्रलोभनों में उलझाने की कोशिशें भी कर सकते है। क्या ये निजि संस्थान उन  प्रलोभनों से ख़ुद को बचा पाएंगेकहीं दुश्मनों से सॉंठ-गॉंठ कर बैठे तोहमें लगता है कि इस विषय में गम्भीरता पूर्वक पुनर्विचार करना ज़रूरी है।

इ)    बिजली सप्लाई से ले कर अन्य ग्रामीण इलाके में मूलभूत सुविधा के अन्य प्रकल्प। इस कानून के तहत्‌ ग्रामीण विभागों में मूलभूत सुविधा प्रकल्पों की व्याख्या बडी लम्बी चौडी की गई है। मगर उस में स्पष्टता का अभाव है। ब्यौरे के अभाव में सुविधा प्रकल्प का नामले कर कोई उद्योजककोई निजि संस्थान अपने मन मा़िफक कोई भी उद्योग वहॉं पर ला सकेंगे और फलस्वरूप बडे पैमाने पर किसानों की भूमि अधिग्रहित होगीइस में नुकसान किसानों का ही होगा।

ई)    गरीब जनता को घर तथा वाज़िब (कम) दामवाले गृह प्रकल्प। यहॉं पर भी वाज़िब मूल्य की व्याख्या में स्पष्टता का अभाव है। कैसे भरोसा करें कि इन गृह प्रकल्पों का सोंग ओढ कर गृह निर्माण व्यवसायी तथा भू-माफिया इसमें घुसपैठ नहीं कर पाएंगेकई शहरों में ऐसी घटनाएं घट चुकी हैंऔर हो भी रही हैं। इस पर से ज़ाहिर तो यही हो रहा है किसरकार भी यही चाहती है कि किसानों की ज़मीनें बडे पैमाने पर बग़ैर अनुमति के अधिग्रहित की जाएं और गृह निर्माण व्यवसायियों को दी जाएं। किसानों की ज़मीन की लूट करने हेतु भू-माफिया इन नितियों का लाभ उठा सरके है। ज़रूरी है कि सरकार इन स्थितियों का गहन अध्ययन करें और सही दिशा में क़दमउठाएं।

उ)     सम्बन्धित सरकारें व उनके उद्यमसंस्थानों द्वारा स्थापित उद्यमविभाग जिनके लिए रेल मार्ग अथवा सडक के दोनों तरफ की किमी ज़मीन का अधिग्रहण किया जाएगा। कानून में किया गया यह प्रावधान देश के पर्यावरण तथा लोक तन्त्र की दृष्टि से गम्भीर चिन्ताजनक है। हमारे देश में करीब 62,000 किमी रेल मार्ग, 92,000 किमी लम्बे राष्ट्रीय महामार्गतथा 132,000 किमी लम्बाई के राज्य महामार्ग हैं। कितने लाख एकड ज़मीन का अधिग्रहण होगा इसका अन्दाज़ा लगा पाना मुश्किल ही है।
 सडकों के दोनों तऱफ वृक्षों की कतारें हैं। बडे परिश्रमपूर्वक करोडों रुपयों की लागत से इन वृक्षों का संवर्धन हुआ है। इस निर्णय की चपेट में ये सभी वृक्ष आ गये हैं। अगर ये वृक्ष कट जाते हैं तो पर्यावरण की असीमित हानि होगी। औद्योगिक इकाइयों के बढते जाने से एक तऱफ रोज़ाना लाखों टन कोयलाडीज़ल,पेट्रोलरॉकेल आदि इन्धन जलाये जाते हैं। उनमें से निकलने वाले कार्बन डाई ऑक्साइड की बढती मात्रा से बीमारियॉं बढ रही हैंपर्यावरण की हानि हो रही हैतापमान बढता जा रहा है। दिन-ब-दिन पर्यावरण का सन्तुलन बिगड रहा है। ऐसी स्थिती में सडकों के दो-तऱफा लगे वृक्षों का कटना बडा ही दुर्भाग्यपूर्ण साबित होगा। पर्यावरण की हानि के प्रति बे़िफक्र रवैयाबग़ैर किसानों की अनुमति के उनकी लाखों एकड ज़मीन का अधिग्रहण केवल इसी बात का संकेत करता है कि इस सरकार को न तो लोक तन्त्र की परवाह है न ही किसानों के हित का ख़यालउनके दिल में ख़याल होगा तो सिर्फ उद्योजकों काअपने करीबी लोगों के विविध संस्थानों का।


ए) निजि-सरकारी साझा प्रकल्पों सहित सभी मूलभूत सुविधा प्रकल्प व सामाजिक सुविधा प्रकल्प जिनमें ज़मीन पर सरकार का स्वामित्व बना रहता है। यह तो ठीक ही है कि सरकार का स्वामित्व बना रहेगाफिर भी ज़रूरी है कि अधिसूचना जारी होने के पूर्वऐसे प्रकल्प के लिए आवश्यक न्यूनतमज़मीन के मद्देनज़र सम्बन्धित सरकार भूमिअधिग्रहण की व्याप्ति सुनिश्चित करे। उसमें भी कानून के तहत सर्वेक्षण करवा कर अनुपजाऊ बंजर ज़मीन का ही अधिग्रहण करे। इस बदल में भी स्पष्टता का अभाव ही है। निजि-सरकारी साझा प्रकल्प के माने कौन से प्रकल्प इस बारे में भी स्पष्टता नहीं है। वही बात है मूलभूत सुविधा प्रकल्पों की या सामाजिक सुविधा प्रकल्पों की। स्पष्टता के अभाव में ऐसे प्रकल्पों को सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन अध्ययन में से भी छूट देने की बात सर-असर किसान हित के विरोध में है। कानून जब बनता है तो उस कानून की हर बाबत में स्पष्टता का होना निहायत ज़रूरी है। अगर नहीं होगी तो अपने अपने हित के परिप्रेक्ष्य में उसका अर्थ निकालने को हर किसी को स्वतन्त्रता होगीऔर इसमें ठगा जाएगा केवल बेबस किसान। इस लिए ज़रूरी है कि सरकार हर बाबत को स्पष्ट करे। किसानों की ज़मीन बग़ैर उनकी अनुमति के निजि संस्थान तथा उद्योजकों को उपलब्ध करवाने से किसानों के मूलभूत अधिकार स्वातन्त्र्य पर ही आँच आ रही है। यह लोकतन्त्र के विरोधी है। कुछ समझ नहीं आता जब सरकार कहती है कि इस कानून में किसानों के हित की रक्षा की गई है। अगर ऐसा है तो सरकार इसे स्पष्ट करे। सरकार का कहना यूं भी है कि अनुपजाऊ ज़मीन तथा बंजर ज़मीन का सर्वेक्षण करा कर रिकार्ड कराने में जनता को भ्रमित किया जाता रहा है। क्या है इसका मतलबकिस लिए यह सब हो रहा है?

 देश की जनता और हमभी इसी लिए मॉंग करते हैं कि देश भर की कुल ज़मीन का सर्वेक्षण करना चाहिए। उनकी स्तर के अनुसार उन्हें क्लास से तक प्रमाणित करें। क्लास से तक की ज़मीनें उद्यमक्षेत्र को नहीं देनी चाहिए। क्लास व की ज़मीनें उद्यमक्षेत्र को उपलब्ध कराने का कानून बनाया जाना चाहिए। ऐसे कानून के बनने से कृषि उपज और औद्योगिक उत्पादन दोनों भी साथ साथ बढते जाएंगे। देश के विकास में मददगार बनेंगे। सरकार आज ऐसी ज़मीनें लेना चाहती है। जिसमें सालाना दो या अधिक फसलें ली जाती हैं। यह किसान और कृषि विरोधी है। इससे कृषि उपज घटेगी। कालान्तर में अनाज की समस्या पैदा होगी।

3) मुख्य कानून विभाग धारा J उपधारा I में-
 अ)कम्पनी कानून 1956 के स्थान पर कम्पनी कानून 2013 होगा।
 इ) धारा वाई के बाद निम्न धारा जोडी जाएगी।
 वाईवाई yy : निजि संस्थान मतलब सरकारी संस्थान अथवा उद्यमके अलावा अन्य कोई भी संस्थान जिनमें एकल संस्थानसाझा संस्थानकम्पनीकॉर्पोरेशन्वयंसेवी संगठन अथवा प्रचलित कानून के तहत्‌ स्थापित अन्य कोई भी संस्थान समाविष्ट होंगे।
इस बात से स्पष्ट होता है कि, 2013 का कम्पनी कानून लागू कर के सरकार अपने करीबी अधिक से अधिक संस्थानों को अधिग्रहण के दायरे में लाना चाहती है। Public Private Partnership के चलते भविष्य में सरकार इन्हें ऐसे प्रकल्प सौंप देगी जिनके लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं रहेगी। कहने की ज़रूरत नहीं है कि यह निर्णय केवल उद्योग जगत व निजि संस्थानों के हित में लिया गया है।


4)     नया अध्याय III-अ को जोडना
 मुख्य कानून में अध्याय के बाद निम्न अध्याय जुडेगा।
अध्याय II व अध्याय III के प्रावधान कुछ विशेष प्रकल्पों को लागू नहीं होंगे।
(विशिष्ट प्रकल्पों को छूट देने का सम्बन्धित सरकारों को अधिकार)
 10अ - सार्वजनीन हितरक्षण हेतु अध्याय II व अध्याय III के प्रावधान लागू करने में से सम्बन्धित सरकार किसी भी प्रकल्प को छूट दे सकती है।

5)     मुख्य कानून धारा 87 के बदले में नई धारा 87
में धारा 87 को बदल कर निम्न धारा आएगी।
इस कानून के तहत्‌ केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार में सेवारत या पूर्व सेवारत किसी व्यक्ति के द्वारा इस प्रकार का अपराध हुआ हो तो सम्बन्धित सरकार की पूर्व अनुमति मिलने पर ही कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर की धारा 197 में दिये गये प्रावधानों के अनुसार न्यायालय उस अपराध पर कार्रवाई करेगा।
इस नई धारा 87 के प्रावधान सम्पूर्णतया किसान हित विरोधी हैं यह बात सा़फ ज़ाहिर है।
यदि कोई बाधित किसान केन्द्र अथवा राज्य सरकार के किसी अफसर के खिला़फ अदालत में शिकायत करना चाहता है तो भी सम्बन्धित सरकार की अनुमति के बग़ैर न्यायालय कोई कार्रवाई नहीं कर पाएगा। अब जिसके खिलाफ शिकायत करनी है उसीसे अनुमति लेनी पडे तो यह कैसे सम्भव हो सकता है?अधिग्रहण प्रक्रिया में फैसले का मुख्य अधिकार ज़िलाधीश के अधीन है। उसीकी अनुमति ले पाना शिकायत कर्ता के लिए कैसे सम्भव हो सकता हैयह निर्णय लोकतन्त्र का गला घोंटने वाला सबित होगा।

6)     धारा 101 में संशोधन
 मुख्य कानून धारा 101 में पॉंच वर्ष की कालावधि के बदले निम्न शब्द आएंगे- ‘‘किसी प्रकल्प की स्थापना हेतु निर्धारित अवधि अथवा अधिक तम पॉंच वर्ष इनमें से जो बाद में/ ज़्यादह हो वह।’’

 इस संशोधन से साबित हो रहा है किनिर्धारित कालावधि के बारे में लाया गया बदलाव किसानों के हित के विरोध में है। कोशिश यह की गई है किकिसानों की ज़मीनें अधिकाधिक कालावधि के लिए सरकार या उद्यमक्षेत्र के कब्ज़े में रहे। इस लिए सही प्रावधान यही होगा किअधिक तमकालावधि की समय सीमा पॉंच वर्ष ही बनी रहे। इस समय सीमा में यदि प्रकल्प स्थापित नहीं हो पाया तो अधिग्रहित ज़मीन मूल मालिक को या उसके वारिसों को अविलम्ब लौटा देनी चाहिए।

7)     धारा 113में संशोधन :
मुख्य कानून धारा 113 उपधारा (1) में
 अ) ‘‘इस विभाग के प्रावधान के बदले ‘‘इस कानून के प्रावधान’’ इन शब्दों का प्रयोग होगा।
 इ) दी गई शर्तों में ‘‘दो वर्ष की कालावधि’’ के बदले ‘‘पॉंच वर्ष की कालावधि’’ इन शब्दों का प्रयोग होगा।
इस संशोधन द्वारा सरकार ने कानून द्वारा प्रदत्त अपने अधिकारों में वृद्धि ही की है। ज़मीन अधिग्रहण को ले कर यदि कोई विवाद उत्पन्न होता हैतो किसान को अब पॉंच वर्ष तक इन्तज़ार करना पडेगा। इस लिए पॉंच वर्ष के बदले दो वर्ष की कालावधि ही उचित होगी। यह संशोधन भी किसान हित विरोधी ही है।

  यद्यपि सरकार यों कहती है कि यह कानून किसानों की हित में हैतथापि ऊपर उल्लेखित मुद्दों से सा़फ हो जाता है किकिस तरह इस कानून द्वारा किसानों के प्रति अन्याय हो रहा है। यह अध्यादेश यदि कानून में परिवर्तित हो जाता है तो पूरे देश को अनाज की आपूर्ति करने वाले अन्नदाता किसानों की कई पीढियॉं बरबाद हो जाएंगी। देश के अनाज उत्पादन पर बहुत ही बुरा असर होगा। इस कानून के लागू होने पर किसानों समेत देश की जनता के हर वर्ग में सरकार के प्रति आक्रोश और असन्तोष की आग भडक उठेगी। देश के पर्यावरण पर विपरीत असर पडेगा। पर्यावरण सन्तुलन के बिगडने पर देश के कुछ हिस्सों में अकाल तो कहीं पर असमय वर्षा जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना किसानों को करना पडेगा। इसलिए देश में भूमिअधिग्रहण कानून के विरोध में चल रहा यह आन्दोलन किसी पार्टी विशेष के खिला़फ न होते हुए केवल किसानसमाजराज्य व राष्ट्रहित सम्बन्धी समस्या को ले कर चल रहा है। हमने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि ‘‘भूमिअर्जन पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रकार व पारदर्शिता अधिकार (संशोधन) विधेयक 2015’’ किस प्रकार किसानों के हित विरोधी है। सरकार से अनुरोध है किहमारे प्रतिपादन में यदि कोई त्रुटियॉं हों तो जवाबी ख़त से हमें अवगत करायेता कि आन्दोलनकारी अपनी गलती को समझ पाएं। और यदि त्रुटियॉं न हों तो इस विधेयक में उचित संशोधन कर के किसानों की हितरक्षा करने वाला कानून बना दिजीए।


सरकार बार बार कह रहीं है कीभूमिअधिग्रहण अध्यादेश किसानों के हित में हैलेकिन उपरोक्त प्रावधानों को देखते हुए ऐसा लगता है कीयह अध्यादेश साफ तौर पर किसान हित के विरोध में है। इसलिए अध्यादेश का पूरी तरह गम्भीरता से अध्ययन कर के हमने उपरोक्त मुद्दे उठाएं है। ऐसे स्थिती में किसानों के हित के बारे मेंसरकार का कहना सच है या हमने उठाएं मुद्दे यह जनता के सामने स्पष्ट होना जरुरी है। इसलिए हमारे इस पत्र के जवाब मे सरकार की राय हमें 25 अप्रील तक मिलने की आशा करते है।
सधन्यवाद,
         
भवदीय,

 कि. बा. उपनाम अण्णा हजारे