विकास
और क्रांति, समग्र
या संपूर्ण क्रांति
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आज ‘विकास,’ ‘क्रान्ति,’ ‘सम्पूर्ण क्रान्ति,’ ‘समग्र
क्रान्ति’ और ‘व्यवस्था-परिवर्तन’ जैसे शब्द हवाओं में हैं । ये गम्भीर अर्थों वाले शब्द हैं, इसलिए जनमानस में इनके विषय में स्पष्टता
और समझदारी विकसित होना जरूरी है ।
इन शब्दों के अर्थ पर सोच-विचार
के क्रम में दूसरे भी अन्य सम्बन्धित विचारों पर सार्थक रोशनी पड़ सकती है ।
पहले
हम यह समझने की कोशिश करें कि ‘क्रान्ति’ (रेवोल्यूशन) क्या है
और यह उद्विकास (एवोल्यूशन) और ‘विकास’
(डेवलपमेंट) से कैसे अलग है ।
विकास की तरह क्रान्ति भी परिवर्तन है । लेकिन क्रान्ति त्वरित परिवर्तन है, तेजी से लाया गया परिवर्तन है । अगर देश ६० महीनों में वे उपलब्धियाँ हासिल कर
लेता है जो ६० वर्षों में हासिल नहीं हो सकीं तो यह विकास कहलाएगा, लेकिन जो ६० वर्षों में नहीं हो सका और उसे
६० हफ्तों या उससे भी कम समय में कर दिखाया गया, तो यह होगी क्रान्ति ।
इसी तरह का फर्क उद्विकास और क्रान्ति के बीच
होता है । इसलिए, क्रान्ति एक त्वरित परिवर्तन है । यह एक ऐसा परिवर्तन भी है जिसका व्यापक प्रभाव
पड़ता है । लेकन चाहे क्रान्ति हो या विकास, यह परिवर्तन एक ऐसी दिशा में होना चाहिए जिसे
लोग सकारात्मक या अच्छी दिशा मान सकें ।
जिस तरह
से इतिहास की पुस्तकें तैयार की जाती हैं उनसे कुछ ऐसा लगता है कि जब भी इंसानी सभ्यता
में एक अच्छी दिशा में कोई त्वरित और व्यापक परिवर्तन हुआ, यह हिंसक तरीकों से हुआ । १७७५-८३ के दौरान का अमेरिकी स्वाधीनता-आन्दोलन एक रक्त-रंजित आन्दोलन था ।
१७८७ और १७९९ के बीच हुई फ़्रांसीसी क्रान्ति भी हिंसा और खून-खराबे से लथपथ थी ।
१९१७
की रुसी क्रान्ति, उसके पहले और
बाद के वर्ष, खून के छीटों
से रंगे रहे । चीन ने जिस क्रान्तिकारी
परिवर्तन द्वारा विश्व के पाँचवे हिस्से की जनसंख्या की नियति बदल डाली, उसमें भी खून की होलियाँ खेली गईं । ताज्जुब नहीं कि ‘क्रान्ति’ शब्द अपने साथ हिंसा की बू लेकर चलता है । मगर अब हम एक नजर कुछ दूसरी महान क्रान्तियों पर
डालें ।
सन् १९००
में दुनिया में इंसान की औसत उम्र हजारों सालों से तीस साल या कम हुआ करती थी । लेकिन १९२६ में पेन्सीलीन की खोज के बाद, और चिकित्सा विज्ञान और स्वास्थ्य सेवाओं
में प्रगति तथा अन्न की उपलब्धता की बढ़ोतरी के कारण इंसानों की उम्र कुछ ही दशकों
में तेजी से बढ़ने लगी और १९८५ में यह ६२ साल हो गई थी । आज जन्म लेने वाले भारतीयों की औसत उम्र-आशा ६७ साल तथा यूरोप, अमेरिका और जापान में ८० साल के करीब हो गई । जो हजारों सालों में नहीं हो सका, वह कुछ दशकों में हो गया — एक त्वरित, सकारात्मक और व्यापक परिवर्तन । यह एक महान क्रान्ति थी । एक गुपचुप क्रान्ति, जो हिंसा की कोख से नहीं उपजी बल्कि मानवीय
मस्तिष्क की शक्तियों के प्रयोग और संगठित इंसानी प्रयासों के माध्यम से घटित हुई । इसी प्रकार औद्योगिक क्रान्ति हिंसा से नहीं हुई ।
उसके पीछे मनुष्य की सोच, अनुसन्धान, कड़ी मेहनत और उद्यमिता जैसे कारण थे । औद्योगिक क्रान्ति ने एकाएक योरोप का, और उसके साथ दुनिया का, नक्शा बदल दिया ।
हम देखेंगे
कि कई क्षेत्रों में भारत में त्वरित क्रान्तियाँ हो सकती हैं । मगर हम ठहराव या धीमे विकास की गति से चल रहे हैं, और यह सब खामख्वाह, क्योंकि महज कुछ कानून और नीतियाँ बदलने से, व्यवस्था और प्रणालियाँ बदलने से, अलग-अलग क्षेत्रों में
तत्काल क्रान्तियाँ आ सकती हैं ।
हौंग-कौंग के ‘इंडिपेंडेंट कमिशन अगेंस्ट करप्शन’ जैसी स्वायत्त और धारदार संस्था राज्यों में
बन जाए, केन्द्र में बन जाए, तो भ्रष्टाचार पर शीघ्र ही अंकुश लग जाए जैसा
कि हौंग-कौंग में हुआ । एक अत्यन्त भ्रष्ट समाज ‘इंडिपेंडेंट कमिशन अगेंस्ट करप्शन’ के गठित होते ही बहुत जल्दी भ्रष्टाचार मुक्त
होने लगा । वहाँ एक क्रान्ति
हो गई ।
कई लोग
अभी भी यह कहने को उद्यत हो सकते हैं कि यह सब तो ठीक है, मगर राजनीतिक क्षेत्र में बिना हिंसा के कोई
बड़ी क्रान्ति नहीं हो सकती, क्योंकि शासक और शोषक वर्ग शान्ति और सुलह से अपना चरित्र नहीं बदलता, स्थान नहीं छोड़ता । ऐसे लोगों को अभी कुछ दशकों पूर्व के महात्मा गाँधी
के नेतृत्व में किए गए उस विराट अहिंसक संघर्ष को याद करना चाहिए जो हिन्दुस्तान की
जनता ने अंगरेजों के विरुद्ध छेड़ा ।
राजनीतिक परिवर्तनों के लिए निश्चय ही संघर्ष
की जरूरत पड़ती है, और पड़ेगी, कभी-कभी तो तीव्र और
लम्बे संघर्ष की, लेकिन जरूरी नहीं कि ये संघर्ष हिंसक हों ।
आज जब
भारत स्वतन्त्र है और जब हमारा अपना जनतन्त्र है, जब हम खुद ही अपना कानून बनाते हैं, खुद ही नीतियाँ बनाते हैं, तो ऐसे में क्रान्तिकारी व्यवस्था-परिवर्तन बिना हिंसा के क्यों नहीं हो सकते ? इसके लिए संघर्ष की जरूरत पड़ेगी, आन्दोलनों की जरूरत पड़ेगी, मगर उनके साथ पहले वैचारिक स्पष्टता की जरूरत
पड़ेगी, चिन्तन और मनन की जरूरत पड़ेगी । ऐसे ही चिन्तन-मनन और जनसंघर्ष के कारण ‘सूचना का अधिकार’-जैसा क्रान्तिकारी कानून आ पाया और एक विशेष क्षेत्र में व्यवस्था-परिवर्तन हुआ ।
अर्थात क्रान्तिकारी व्यवस्था-परिवर्तन के लिए कारगर अहिंसक अस्त्र-शस्त्र देश में
उपलब्ध हैं । सिर्फ उनका प्रयोग
हमें सूझ-बूझ के साथ और दृढ़
निश्चय के साथ करना है ।
ये तो
हुई बातें क्रान्ति की, हिंसक और अहिंसक क्रान्तियों की । अब हम आएँ समग्र या सम्पूर्ण क्रान्ति पर । समग्र क्रान्ति एक ऐसा त्वरित परिवर्तन है जो वैयक्तिक
और सामाजिक जीवन के किसी एक क्षेत्र में नहीं बल्कि कई प्रमुख क्षेत्रों में एक साथ
घटित होता है, जिनमें राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक संरचना, सामाजिक चेतना और इसी प्रकार अन्य सभी प्रमुख
क्षेत्र शामिल हैं ।
समग्र क्रान्ति बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों, स्त्रियों और पुरुषों, बच्चों और बुजुर्गों, उत्तर और दक्षिण, पूरब और पश्चिम सभी को क्रान्ति-चक्र में खींचती है ।
किसी भी परिवर्तन का हमारे ऊपर रचनात्मक प्रभाव पड़े
इसके लिए जरूरी है कि उस परिवर्तन को इस प्रकार लाया जाए कि वह हमारे जीवन को असह्य
न बना दे । बिना समुचित परिवर्तन-प्रबन्धन के कोई भी त्वरित परिवर्तन खतरनाक
हो सकता है ।
एक सभ्यता को उसकी जड़ों से उखाड़ कर, उसके इतिहास से उखाड़कर, उसे पुष्पित-पल्लवित
नहीं किया जा सकता ।
परिवर्तन की गति चाहे जितनी भी तेज हो, हमारी सभ्यता का वृक्ष चाहे जितनी भी तेजी से आसमान की ओर बढ़े, उसे अपनी जड़ों के ऊपर ही बढ़ना होगा ।
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