Sunday, 12 April 2015

भारत के अतीत से सुराज की झलकियाँ : तुलसीदास द्वारा रामराज्य का वर्णन - अंश १

आज जब सुराज या सुशासन के अभाव में शासकों से जनता त्रस्त है, शासकों के कदाचार, भ्रष्टाचार और जनविरोधी नीतियों और कृत्यों के कारण जनता के लिए सुखी जीवन स्वप्न होता जा रहा है, विषमता और आपसी लड़ाई-झगड़ों से सामाजिक जीवन नरक हो गया है, रामराज्य की परिकल्पना शासक और शासित दोनों को फिर से सुराज के स्वरुप पर सोचने को प्रेरित करती है. इस देश में पुराने समय में, अन्य देशों से बहुत अलग, बड़ी संख्या में राजाओं द्वारा अपना जीवन प्रजा के सुख और कल्याण को समर्पित करने की एक मजबूत परम्परा रही है जिसकी श्रृंखला में राजा राम ने भी योगदान दिया और जनतांत्रिक और जनमुखी शासन का एक अतुल्य उदाहरण प्रस्तुत किया. रामराज्य कैसा था इसका जो वर्णन रामचरितमानस में है वह पाठकों की जानकारी के लिए उद्धृत किया जाता है. रामराज्य का अर्थ राजतंत्र लाना नहीं है. यानी पाठक नीचे के उद्धरणों की भावना पर जायें न कि केवल शब्दों पर. यह भी ध्याम में रहे कि यह वर्णन कविता में है; इसलिए अर्थ लगाने में गद्य-जैसा प्रयास न करें. पाठकों में से अनेक श्रीराम को भगवान का अवतार मानते हैं; मगर यहाँ उन्हें एक राजा के रूप में ही देखें तो अधिक न्याय होगा; यानी शासक हों तो राम जैसे, और राज जो तो रामराज जैसा. 
(तुलसीदास के रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड के दोहा संख्या १९ और दोहा संख्या २३ के बीच से कुछ अंश - )

हम प्रत्येक दिन कुछ पंक्तियों और उनके साधारण अर्थ पर विचार करेंगे और उनपर कुछ विशेष टिप्पणियां भी करेंगे.

राम राज बैठें त्रैलोका | हर्षित भये गए सब सोका ||
बैर न कर काहू सन कोई | राम प्रताप बिषमता खोई ||

साधारण अर्थ : श्री राजचन्द्र के राज्य पर प्रतिष्ठित होने पर तीनों लोक हर्षित हो गए, उनके सारे शोक जाते रहे. कोई किसी से वैर नहीं करता. श्रीराम के प्रताप से विषमता ख़तम हो गयी.
विशेष टिपण्णी : श्री राम ने विषमता ख़तम की; समतामूलक समाज स्थापित किया. निषादराज केवट और शबरी से उनके व्यवहार भी इसी प्रयास के व्यक्तिगत उदाहरण थे. समाजवाद का मुख्य विचार होता है समता - वर्णन के शुरुआत में ही 'समता' वाले पक्ष पर जोर हम देख सकते हैं. समता पर और भी अंश आगे हैं.  एक और बात ध्यान देने योग्य है - कोई किसी से दुश्मनी नहीं करता - जनता इस प्रकार की है. क्या कोई राजा या शासक ऐसा कर सकता है कि  सभी नागरिक ऐसे स्वभाव वाले हो जायें? ऐसा समाज सिर्फ राजा का योगदान नहीं हो सकता. इसमें और भी सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक नेताओं की भूमिका बनती है; मगर राजा इसके लिए वातावरण तैयार कर सकता है. 'वैर' एक भावना है, और प्रत्येक नागरिक के भावना-परिष्करण या 'इमोशन कल्चरिंग' के लिए शिक्षा व्यव्वस्था में उपाय करने पड़ते हैं, जो आज नहीं हो रहे हैं. करिक्युलम में 'इमोशनल लिट्रेसी' कहीं भी कभी भी नहीं सिखाई जाती.  फिर राजा का अपना  स्वभाव और चरित्र भी जनता का चरित्र प्रभावित और निर्धारित करता है. राम का स्वभाव स्वयं भी निर्वैर है.

बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग |
चलही सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग ||

साधारण अर्थ : सभी वर्णों के लोग (ज्ञान प्राप्त करने और ज्ञान बाँटने वाला वर्ग, शासक वर्ग, कृषक और व्यवसायी वर्ग, और सेवा-क्षेत्र में काम करने वाला वर्ग) अपना-अपना धर्म (कर्त्तव्य) उचित प्रकार से निर्वाह करते हैं और वेद के बताये मार्ग पर चलते हुए सुख पाते हैं. जनता को न किसी बात का भय है, न कोई रोग न शोक.

विशेष टिपण्णी : जनता को किसी प्रकार का भय नहीं इसका अर्थ है कि कहीं अपराध नहीं और कोई अपराधी नहीं, राज्य के अधिकारियों की  प्रतारणा का भय नहीं;  आत्मानुशासन है, राज्य के नियम भंग नहीं करते इसलिए इसलिए क़ानून का भय भी नहीं; स्वस्थ जीवन शैली के कारण और राजकीय स्वास्थ्य व्यवस्था के कारण लोग रोगमुक्त हैं; लोग सब प्रकार से प्रसन्न हैं इसलिए कोई शोक नहीं. सभी ‘वर्ण’ (ज्ञानी-पंडित-पुरोहित, शासक और योद्धा, व्यवसायी, तथा सेवा क्षेत्र के लोग) अपना अपना धर्म उत्कृष्टा से निबाहते थे – एक्सेलेंट तरीके से अपना काम करते थे  जैसा कि हम आज भी चाहते हैं. मगर यहाँ ध्यान रहे कि ‘वर्ण’ ‘जाति’ से अलग चीज़ है.  ‘वर्ण’ को आज कामकाजी वर्ग (occupational classes) के रूप में समझा जा सकता है. हर औक्यूपेशनल वर्ग को आज भी अपना धर्म  उत्तम तरीके से निबाहना चाहिए, तभी तो राष्ट्र उत्कर्ष की ओर जाएगा!

No comments:

Post a Comment