Tuesday, 28 April 2015

रामराज्य में हरितक्रान्ति, श्वेतक्रान्ति और गृहउद्योग - भाग ९

लता बिटप मागें मधु चवहीं | मनभावतो धेनु पय श्रवहीं ||
ससी संपन्न सदा रह धरणी | त्रेता भइ कृतजुग कै करनी ||

साधारण अर्थ : बेलें और वृक्ष माँगने से ही मधु टपका देते हैं. गौएं मनचाहा दूध देती हैं. धरती सदा खेती से भरी रहती है. त्रेता में सतयुग की करनी (स्थिति) हो गयी.


विशेष टिपण्णी : ‘ससी संपन्न सदा रह धरणी’ से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि हरितक्रान्ति हो चुकी है, और खेतों में कई फसलें ली जाती हैं – तभी तो धरती हमेशा फसलों से भरी रहती है! ‘गायें मनचाहा दूध देती हैं’ श्वेत क्रान्ति की और संकेत करता है! ‘लता बिटप मागें मधु चवहीं’ यह संकेत करता है कि मधुमक्खियों का पालन हर दूसरे वृक्ष पर हो रहा है, आर्थात लधु और गृह-उद्योगों का जाल रामराज्य में बिछा हुआ है. कृषि, पशुपालन और लघु उद्योग में ही अभी भी भारत की समृद्धि के सूत्र छिपे हुए हैं. 

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