Tuesday, 14 April 2015

राम राज्य का विचार - भाग ३



चारिउ चरन धर्म जग माहीं | पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं ||
राम भगति रत नर अरु नारी | सकल परम गति के अधिकारी ||

साधारण अर्थ : धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, शौच , दया और दान) से जगत में परिपूर्ण हो रहा है, स्वप्न में भी कहीं पाप नहीं है. पुरुष और स्त्री सभी राम भक्ति के परायण हैं और सभी परम गति के अधिकारी हैं.


विशेष टिपण्णी : जनता में से किसी का भी सपने में भी पाप (अघ) नहीं करना यह संकेत करता है कि शिक्षा की ऎसी विकसित व्यवस्था होगी जो सभी को ऊंचे जीवनमूल्य (वैल्यूज़) सिखाती होगी. इसके अलावा जब राजा स्वयं ही निष्पाप (बिना अघ का) होगा तभी उसका उदाहरण देख कर जनता भी निष्पाप आचरण करेगी. आज राजा यानी शासक और जन प्रतिनिधि भ्रष्ट हैं तो जनता भी देखा-देखी भ्रष्ट हो गयी है. सिर्फ शिक्षा देने से लोग निष्पाप नहीं हो सकते. राम स्वयं एक निष्पाप व्यक्ति – निष्पाप राजा – थे. इसीलिए जनाता भी इतनी निष्पाप थी कि प्रायः सभी परम गति यानी मोक्ष के अधिकारी हो गए थे. एक शासक की इससे बड़ी उपलब्धि क्या हो सकती है!

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