Friday, 17 April 2015

क्रान्ति लाने के तीन सूत्र

सुराज के लिए क्रान्ति लाने के तीन मुख्य सूत्र


जहां देश में इतना कुशासन हो, इतनी अंधेरगर्दी और भ्रष्टाचार हो, वहाँ सुराज या सुशासन अगर कुछ महीनों और वर्षों में तभी आ सकता है जब एक क्रान्ति हो जाय – एक अहिंसक क्रान्ति, बिना रक्तपात के क्रान्ति – बिना बंदूक उठाए क्रान्ति – जनतांत्रिक  तरीके से क्रान्ति!

मगर ऎसी क्रान्ति को अगर क्षणिक नहीं होना, टिकाऊ होना है तो इसके लिए तीन चीज़ों की जरूरत होगी जिन्हें याद रखना जरूरी है –

·         एक क्रांतिकारी नेतृत्व की श्रृंखला
·         एक क्रांतिकारी संगठन
·         एक क्रान्तिकारी कार्यक्रम

इनमें से अगर एक की भी कमी है तो क्रान्ति अधूरी रह जाएगी.

मगर क्रान्ति है कया?
क्रान्ति एक त्वरित परिवर्तन है, तेजी से लाया गया परिवर्तन है - ऐसे परिवर्तन तो अच्छी दिशा में, वांछनीय दिशा में हों.

क्रांतिकारी नेतृत्व का अर्थ है ऐसा नेतृत्व जो यथास्थितिवादी (status quoist) नहीं  हो, जो ‘जैसा है वैसा चलने दो’ , या ‘चलता है’ वाली मानसिकता वाला नहीं हो बल्कि परिवर्तन – त्वरित परिवर्तन लाने को दृढसंकल्प हो और उसके लिए परेशानियाँ  झेलने को तैयार हो, सुविधाभोग की अपेक्षा मेहनत-मशक्कत करने को तैयार हो,  जनता को चैन  की नींद सुलाने के लिए खुद अपनी नींद कुरबान करने को तैयार हो!
लेकिन एक नेता के क्रांतिकारी स्वभाव रखने से क्रान्ति नहीं हो सकती – क्रांतिकारी नेतृत्व की एक श्रंखला गाँव से ले कर ऊपर तक खड़ी करनी  होगी. ऐसा क्रांतिकारी नेतृत्व विक्सित करना होगा.

मगर परिवर्तन एस तो नहीं हो कि आदमी का जीना दूभर हो जाये, बल्कि ऐसा हो कि आम आदमी ख़ुशी महसूस करे, उसके जीवन की गुणवत्ता बढ़ जाये. इसीलिए परिवर्तन की सुविचारित रूपरेखा के बिना परिवर्तन दुखदायी हो सकते हैं. 
१९७० के दशक में सम्पूर्ण क्रान्ति का आन्दोलन इसी लिए असफल हो गया क्योंकि तब  जयप्रकाश जी के रूप में एक क्रांतिकारी नेतृत्व तो उपलब्ध था मगर न तो कोई क्रान्तिकारी संगठन बन पाया था न ही कोई क्रांतिकारी कार्यक्रम की रूप-रेखा ही सामने आ पाई थी.

एक अहिंसात्मक क्रांतिकारी संगठन क्रान्तिचेतस लोगों का एक संगठन हुआ करता है, जिसके लोगों की राष्ट्रचेतना विकसित होती है, जो क्रांतिकारी कार्यक्रम को समझते हैं, उस कार्यक्रम के अनुरूप परिवर्तन लाने की भावना रखते हैं , जो उन परिवर्तनों को  लाने के लिए संघर्ष कर सकते हैं, रचनात्मक कार्य कर सकते हैं, सेवा-कार्य कर सकते हैं, कठिनाईयां झेल  सकते हैं, अहिंसा के सिद्धांत और व्यहार को आत्मसात कर चुके होते हैं,


ध्यान र्राहे कि संगठन  और जमात में बहुत बड़ा फर्क  होता है. जमात अधिक दिनों तक साथ नहीं चल सकता क्योंकि उसके को एक सीमित उद्देश्य से साथ जुड़ जाते हैं, मगर उनके बीच एक गंभीर ‘आइडियोलोजिकल’ एका नहीं होती, अर्थात उनके बीच गम्भीर और व्यापक सैद्धांतिक सहमति नहीं होती. उनके स्वार्थ और व्यक्तिगत अहंकार अधिक प्रबल होते हैं. फिर वे भावनात्मक रूप से भी गहनता के साथ  आपस में नहीं जुड़े होते. दूसरी और संगठन में संगठन के उद्देश्य व्यक्ति के हित और स्वार्थ से हमेशा ऊपर होते हैं और सदस्यों में एक आत्मानुशासन होता है. इंडिया अगेंस्ट करप्शन एक जमात के तौर पर सीमित उद्देश्यों को ले कर खडा  हुआ, इसी लिए उसे टूटते देर नहीं लगी. आम आदमी पार्टी भी संगठन नहीं जमात के सिद्धांतों पर खड़ा हुआ है.  देश में परिवर्तन लाने के लिए हमें जमात नहीं संगठन खडा करना होगा. संगठन एक हाथ की तरह होता है जिसकी पांच उंगलियाँ समान नहीं होते हुए भी किसी वस्तु को मिल कर मजबूती से पकड़ती हैं, अपनी वस्तु (उद्देश्य) को पकड़ते वक्त आपस में विरोध नहीं होता, सामंजस्य बना रहता है. सर्वोत्तम संगठन तो एक मिल्लत वाले परिवार की तरह होता है, आपस में परें और सौदार्द्र, त्याग, और उचित स्वतन्त्रता.

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