फूलहिं
फरहि सदा तरु कानन | रहहिं एक सँग गज पंचानन |
खग मृग सहज
बयरु बिसराई | सबन्हि परस्पर प्रीती बढ़ाई ||
साधारण अर्थ :
वन में वृक्ष सदा फ्फलाते और फूलते हैं. हाथही और सिंह वैर भूल कर एक साथ रहते
हैं. पक्षी और पशु सभी ने स्वाभाविक वैर भुला कर आपस में प्रेम बढ़ा लिया है.
विशेष
टिपण्णी : वृक्ष जंगल और उद्यान
सुरक्षित हैं तभी तो फूलते-फलते हैं. उन्हें कोई काट कर रामराज में नष्ट नहीं
करता, नुकसान नहीं पहुँचाता – ‘फौरेस्ट प्रोटेक्शन’ कारगर है.
कूजहिं खग
मृग नाना बृंदा | अभय चरहिं बन चरहिं अनंदा ||
सीतल सुरभि
पवन बह मंदा |गुंजत अलि लै चलि मकरंदा ||
साधारण
अर्थ : पक्षी कूजते हैं, भांति-भांति के पशुओं के समूह वन
में निर्भय विचरते और आनंद करते हैं. शीतल मंद सुगन्धित पवन चलता रहता है. भंवरे
पुष्पों का रस ले कर चलते हुए गुंजार कर्राते जाते हैं.
विशेष
टिपण्णी : अहिंसा का सिद्धांत
सिर्फ मनुष्यों पर लागू नहीं है, दया सिर्फ मनुष्यों तक सीमित नहीं, बल्कि
पशु-पक्षियों पर भी लागू है; तभी तो पशु बिना भय के जंगलों में विचरते हैं! यानी
पशुओं को मनुष्यों से कूई भय नहीं है. हर जगह सुगन्धित फूलों के पेड़ लगे हुए हैं
तभी तो हवाएं सुगंध ले कर चलती हैं और भंवरे गुंजार करते रहते हैं!
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